UDAN के 10 साल: उड़ान मिली तो है, पर टिकट की कीमत अब भी सवाल है
UDAN Scheme 10 Years: मान लीजिए आप किसी छोटे शहर में रहते हैं और दिल्ली जाना है। ट्रेन में 10 घंटे लगेंगे। रिज़र्वेशन की मशक्कत, स्टेशन तक की भागदौड़, और पहुंचते-पहुंचते कमर का हाल बुरा। फ्लाइट से यही सफर कुछ ही घंटों में निपट जाता। आप ऐप खोलते हैं, किराया देखते हैं, और फोन चुपचाप जेब में वापस। हवाई सफर का सपना वहीं दम तोड़ देता है। ये किसी एक आदमी की कहानी नहीं है।
छोटे शहरों में लाखों लोग हर साल यही हिसाब लगाते हैं और ट्रेन की लाइन में लग जाते हैं। सरकार ने 10 साल पहले इसी दूरी को कम करने का वादा किया था। योजना का नाम रखा गया UDAN, यानी “उड़े देश का आम नागरिक”। अब एक दशक बीत चुका है। तो चलिए ईमानदारी से देखते हैं कि आम नागरिक कितना उड़ पाया।
UDAN Scheme 10 Years: आंकड़े क्या कहते हैं
21 अक्टूबर 2016 को ये योजना शुरू हुई थी। इरादा साफ़ था: छोटे शहरों को हवाई नक्शे पर लाना और सफर को सस्ता बनाना। 10 साल पूरे होने पर सरकार ने जो आंकड़े जारी किए हैं, वो काफ़ी बड़े हैं। इस योजना के तहत 1.72 करोड़ यात्री सफर कर चुके हैं। 687 क्षेत्रीय मार्गों पर उड़ानें शुरू हुईं। 95 एयरोड्रोम चालू हुए, जिनमें 17 हेलिपोर्ट और 2 वाटर एयरोड्रोम भी हैं।

इसका मतलब ये है कि हवाई जहाज़ अब सिर्फ़ दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु जैसे महानगरों की चीज़ नहीं रह गया। छोटे शहरों और दूर-दराज़ के इलाकों तक भी पहुंचने की कोशिश हुई है। और इसका फ़ायदा अकेले मुसाफ़िरों को नहीं मिलता। जहां उड़ानें पहुंचती हैं, वहां सैलानी भी पहुंचते हैं, दुकानदारों की बिक्री बढ़ती है और नौजवानों को काम के नए रास्ते दिखते हैं। पर कहानी इतनी सीधी भी नहीं है।
एयरपोर्ट बनना एक बात, फ्लाइट चलना दूसरी बात
हमारे यहां कहते हैं, “दूर के ढोल सुहावने।” किसी शहर में चमकता हुआ एयरपोर्ट खड़ा हो जाए, फीता कट जाए, फोटो छप जाएं, ये सब आसान है। मुश्किल है वहां से रोज़ नियमित फ्लाइट उड़ाना। सोचिए, किसी छोटे शहर से विमान उड़ता तो है, मगर आधी सीटें खाली रह जाती हैं।
एयरलाइन के लिए ये सीधा घाटा है। तेल का खर्च, पायलट और क्रू की तनख्वाह, इंजन की देखभाल, ये सब हर उड़ान पर लगता ही लगता है। टिकट से इतना पैसा न आए तो कंपनी कब तक खुद की जेब से भरेगी? आखिर में वो उस रूट को बंद कर देती है, और शहर वाले फिर वहीं के वहीं।
सरकार ने इसका हल क्या निकाला
इसी मुश्किल के लिए सरकार Viability Gap Funding, यानी VGF देती है। आसान भाषा में, ये वो रकम है जो घाटे वाले रूट को शुरुआती दिनों में चलाए रखने के लिए एयरलाइन को दी जाती है, ताकि उसे नुकसान की वजह से भागना न पड़े। सरकारी जानकारी के मुताबिक 15 अक्टूबर 2026 तक UDAN के तहत ₹5,091.23 करोड़ की VGF बांटी जा चुकी है। रकम छोटी नहीं है।
अब असली सवाल यहीं से उठता है। जो रूट सरकारी बैसाखी पर खड़े हुए हैं, क्या वो बैसाखी हटने के बाद भी चल पाएंगे? इसका कोई एक जवाब नहीं है। किसी शहर में हां होगा, किसी में नहीं। इसीलिए सिर्फ़ ये गिनाना कि इतने एयरपोर्ट बने और इतने रूट खुले, पूरी तस्वीर नहीं दिखाता। ज़्यादा काम की बातें दो हैं। पहली, क्या वहां फ्लाइट सचमुच नियमित चल रही है? दूसरी, क्या टिकट इतना सस्ता है कि एक आम परिवार भी सोच सके?
अब आगे की तैयारी
सरकार ने इस योजना का नया रूप भी तैयार किया है, जिसे Modified UDAN कहा जा रहा है। ये वित्त वर्ष 2026-27 से 2035-36 तक चलेगी और इसके लिए कुल ₹28,840 करोड़ रखे गए हैं। योजना में 100 एयरपोर्ट विकसित करना, 200 आधुनिक हेलिपैड बनाना और क्षेत्रीय उड़ानों को आर्थिक सहारा देना शामिल है। आंकड़े बड़े हैं, इसमें शक नहीं। पर इनकी असली परीक्षा कागज़ पर नहीं, ज़मीन पर होगी।

परीक्षा तब पास मानी जाएगी जब इन सुविधाओं में सवार होने वाले लोग भरपूर हों, उड़ानें बिना नागा चलें और किराया जेब पर बोझ न बने। वरना वही हाल होगा जिसके लिए पुरानी कहावत बनी है, “नाम बड़े और दर्शन छोटे।” एयरपोर्ट बना देना बेशक एक उपलब्धि है। उसकी तारीफ़ होनी चाहिए। मगर उसे उस दुकानदार, उस विद्यार्थी और उस बुज़ुर्ग के काम का बना देना, जिसे इलाज के लिए बड़े शहर जाना है, इससे कहीं ज़्यादा कठिन काम है। और असली कामयाबी वहीं छिपी है।
आखिर में
10 साल में UDAN ने छोटे शहरों के आसमान में हलचल ज़रूर मचाई है। 1.72 करोड़ लोगों का उड़ना कोई मामूली बात नहीं। पर सस्ती और टिकाऊ हवाई सेवा का जो सपना योजना के नाम में ही बसा है, वो अभी अधूरा है। उसे पूरा करने की ज़िम्मेदारी अब Modified UDAN पर है। अब आपसे एक सीधा सवाल। मान लीजिए कल आपके शहर से दिल्ली या मुंबई की सीधी फ्लाइट शुरू हो जाए। आप एक तरफ़ का कितना किराया खुशी-खुशी दे देंगे? ₹2,000? ₹3,000? या उससे ज़्यादा? कमेंट में बताइए, क्योंकि इसी जवाब में पूरी योजना का भविष्य छिपा है।
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