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क्या अब प्लास्टिक के नोट चलेंगे? RBI के पॉलिमर नोट प्लान की पूरी कहानी

एक दस रुपये का नोट पानी में गिरे और बिना गलें, बिना फटे वापस आपकी जेब में पहुंच जाए, ऐसा सोचकर देखिए। यही वो चीज़ है जिसकी टेस्टिंग अब भारत में शुरू होने वाली है। पिछले हफ्ते संसद में सरकार ने बता दिया कि रिज़र्व बैंक को ₹10 और ₹20 के पॉलिमर नोट छापने की मंज़ूरी मिल गई है। खबर फैलते ही सोशल मीडिया पर सवालों की बाढ़ आ गई, क्या पुराने नोट बंद होंगे, क्या यह एक और नोटबंदी है, क्या सारा कागज़ी पैसा बदल जाएगा। जवाब इतना सीधा नहीं है, तो चलिए पूरी बात सिलसिलेवार समझते हैं।

संसद में क्या बताया गया

27 जुलाई 2026 को वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने लोकसभा में एक लिखित जवाब में बताया कि सरकार ने RBI के उस प्रस्ताव को मंज़ूरी दे दी है जिसमें ₹10 और ₹20 के पॉलिमर नोटों का फील्ड ट्रायल करने की बात कही गई थी। यह मंज़ूरी RBI एक्ट, 1934 की धारा 25 के तहत, केंद्रीय बोर्ड की सिफारिश पर दी गई। मंत्री ने साफ कहा कि यह सिर्फ ट्रायल के लिए है, कागज़ी नोट हटाने का फिलहाल कोई प्रस्ताव नहीं है। कुल मिलाकर दोनों नोटों के एक-एक अरब यानी करीब दो अरब पॉलिमर नोट छापे जाएंगे, और यह पूरी खेप बाज़ार में मौजूदा कागज़ी नोटों के साथ-साथ चलेगी।

दिलचस्प बात यह है कि RBI की छपाई करने वाली सहायक कंपनी, भारतीय रिज़र्व बैंक नोट मुद्रण प्राइवेट लिमिटेड यानी BRBNMPL, ने सरकारी मंज़ूरी मिलने से पहले ही 17 जुलाई को दुनियाभर के मैन्युफैक्चरर्स से 68,000 रीम खास पॉलिमर शीट मंगाने के लिए टेंडर निकाल दिया था। यानी तैयारी काफी पहले से चल रही थी, संसद में सिर्फ इसकी औपचारिक पुष्टि हुई।

यह विचार नया नहीं है

भारत में पॉलिमर नोट की बात 2012 में भी उठी थी। उस वक्त पांच शहरों, जयपुर, शिमला, भुवनेश्वर, मैसूर और कोच्चि में ₹10 के प्लास्टिक नोट का ट्रायल होना था, अलग-अलग मौसम वाले शहर इसलिए चुने गए थे ताकि पता चले कि गर्मी, नमी और ठंड में नोट कैसा बर्ताव करता है। लेकिन तकनीकी दिक्कतों के चलते वह योजना ठंडे बस्ते में चली गई। अब करीब डेढ़ दशक बाद यह विचार फिर लौटा है, और इस बार वजह भी साफ है। नोट छापने की मशीनें, ATM और नोट गिनने वाले उपकरण अब पॉलिमर सब्सट्रेट को पहले से बेहतर तरीके से हैंडल कर सकते हैं।

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सिर्फ 10 और 20 के नोट ही क्यों

यह कोई मनमाना फैसला नहीं है। छोटे नोट सबसे ज़्यादा हाथों से गुज़रते हैं, चाय की दुकान से लेकर सब्ज़ी वाले तक, और इसी वजह से सबसे तेज़ी से गंदे, मुड़े-तुड़े या फटे भी होते हैं। इनकी उम्र बाकी नोटों के मुकाबले सबसे कम होती है, तो इन्हें बार-बार छापना पड़ता है। जाहिर है, अगर टिकाऊपन टेस्ट करना है तो सबसे कमज़ोर कड़ी से शुरुआत करना ही समझदारी है।

आंकड़े क्या कहते हैं

वित्त वर्ष 2025 में नोट छापने पर सरकार का खर्च बढ़कर 6,372.8 करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जबकि पिछले साल यह 5,101.4 करोड़ रुपये था। इसी साल करीब 23.8 अरब गंदे और खराब नोट चलन से बाहर निकाले गए, जो पिछले साल के 21.24 अरब से 12.3 प्रतिशत ज़्यादा है। इनमें सबसे बड़ा हिस्सा ₹500 के नोटों का रहा, उसके बाद ₹100 का नंबर आता है। दूसरी तरफ, 15 मई तक बाज़ार में चल रही कुल नकदी रिकॉर्ड 42.86 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच चुकी थी, यानी सालाना आधार पर 11.5 प्रतिशत की बढ़त। नोट जितने ज़्यादा चलेंगे, उतने ही जल्दी घिसेंगे भी, और यही पूरा गणित पॉलिमर की तरफ धकेल रहा है।

पॉलिमर नोट पेपर नोट से अलग कैसे हैं

कागज़ के नोट कॉटन की खास किस्म से बनते हैं, जबकि पॉलिमर नोट एक पतली, चमकदार प्लास्टिक फिल्म पर छपते हैं। यह फिल्म पानी सोखती नहीं, गंदगी कम चिपकती है, और मुड़ने-तुड़ने के बाद भी अपनी शक्ल बरकरार रखती है। अनुमान है कि पॉलिमर नोट पेपर नोट से दो से पांच गुना ज़्यादा टिकते हैं। शुरुआत में इन्हें बनाना पेपर नोट से करीब 20 से 24 प्रतिशत महंगा पड़ता है, लेकिन क्योंकि यह लंबे समय तक टिकते हैं, बार-बार छापने का खर्च बच जाता है, तो कुल मिलाकर लागत कम बैठती है।

सुरक्षा के लिहाज़ से भी पॉलिमर एक कदम आगे है। इसमें पारदर्शी खिड़की जैसा हिस्सा जोड़ा जा सकता है, जिसे नकली नोट बनाने वाले आसानी से कॉपी नहीं कर पाते। इसके अलावा होलोग्राम, रंग बदलने वाली स्याही और महीन सुरक्षा धागे जैसी चीज़ें भी पॉलिमर सतह पर ज़्यादा प्रभावी ढंग से काम करती हैं, क्योंकि प्लास्टिक की सतह इन बारीक डिज़ाइनों को कागज़ से बेहतर पकड़ पाती है।

दुनिया पहले से इस रास्ते पर चल चुकी है

ऑस्ट्रेलिया ने 1988 में सबसे पहले पॉलिमर नोट जारी किया था, और 1996 तक उसकी पूरी करेंसी ही पॉलिमर पर आ गई। इसके बाद कनाडा, ब्रिटेन, सिंगापुर, मलेशिया, थाईलैंड, इंडोनेशिया, रोमानिया, न्यूज़ीलैंड और वियतनाम जैसे साठ से ज़्यादा देशों ने यह तकनीक अपनाई। इन देशों के अनुभव से एक बात साफ निकलती है, पॉलिमर पर स्विच करना एक झटके में होने वाला काम नहीं है, यह सालों में धीरे-धीरे होता है, और शुरुआत लगभग हमेशा सबसे छोटे या सबसे ज़्यादा चलने वाले नोट से होती है।

क्या पुराने नोट बेकार हो जाएंगे

बिलकुल नहीं। सरकार ने यह बात बार-बार दोहराई है कि पुराने कागज़ी नोट पूरी तरह वैध बने रहेंगे, दोनों तरह के नोट साथ-साथ चलेंगे। यह नोटबंदी जैसा कोई कदम नहीं है, बल्कि सिर्फ यह जांचने की कोशिश है कि भारत की गर्मी, बारिश और उमस में पॉलिमर नोट कैसा बर्ताव करता है। अगर ट्रायल सफल रहा तभी आगे बड़े पैमाने पर छपाई पर फैसला होगा, वरना योजना वहीं रुक भी सकती है, जैसा 2012 में हुआ था।

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डिजिटल पेमेंट का क्या होगा

UPI के इस दौर में यह सवाल लाज़मी है कि प्लास्टिक के नोटों की ज़रूरत ही क्या है। खुद RBI ने सरकार को बताया है कि इस बारे में अभी कुछ कहना जल्दबाज़ी होगी, असर का सही अंदाज़ा तभी लगेगा जब नोट बड़े पैमाने पर चलन में आएंगे। फिलहाल नकदी और डिजिटल भुगतान दोनों साथ-साथ चल रहे हैं, और नकद अभी भी देश के बड़े हिस्से, खासकर छोटे कस्बों और गांवों में रोज़मर्रा के लेनदेन की रीढ़ बना हुआ है।

आगे क्या होगा

अभी सिर्फ इतना तय है कि ट्रायल शुरू होगा, नोट सर्कुलेशन में आएंगे, और उनका प्रदर्शन परखा जाएगा, टिकाऊपन से लेकर लोगों की प्रतिक्रिया तक। इसके बाद RBI अपना आकलन तैयार करेगा और तभी तय होगा कि बड़े स्तर पर छपाई शुरू करनी है या नहीं। अगर सब कुछ ठीक रहा तो यह भारत की करेंसी में दशकों की सबसे बड़ी तब्दीली बन सकती है, लेकिन अभी उस मुकाम तक पहुंचने में वक्त लगेगा। फिलहाल आपकी जेब में जो ₹10 और ₹20 के मुड़े-तुड़े नोट पड़े हैं, वे कहीं जाने वाले नहीं, बस उनके साथ जल्द ही कुछ चमकदार, थोड़े अलग दिखने वाले साथी भी जुड़ सकते हैं।


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