भारत में डिजिटल पेमेंट(Digital Payment) जितनी तेजी से बढ़ा है, उतनी ही तेजी से साइबर फ्रॉड(Cyber Fraud) का खतरा भी बढ़ा है। आज पैसे भेजने में कुछ सेकंड लगते हैं, लेकिन अगर वही पैसा किसी फ्रॉडस्टर के हाथ चला जाए, तो उसे वापस लाने में कई दिन, हफ्ते या कभी-कभी उससे भी ज्यादा समय लग सकता है। यही वजह है कि साइबर फ्रॉड अब सिर्फ किसी व्यक्ति के साथ हुई ऑनलाइन ठगी का मामला नहीं रह गया है।
यह भारत के बैंकिंग सिस्टम, डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम, टेलीकॉम नेटवर्क और कानून-व्यवस्था से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन चुका है। और अब इस मामले में संसद की एक समिति ने सरकार के जवाब पर ही सवाल उठा दिए हैं। समिति का कहना है कि साइबर फ्रॉड से निपटने के लिए सरकार ने कई कदम जरूर उठाए हैं, लेकिन इन कदमों के बावजूद सिस्टम में कुछ अहम कमियां अभी भी बनी हुई हैं। खास बात यह है कि समिति ने सिर्फ नई योजनाएं शुरू करने की बात नहीं की, बल्कि यह पूछा है कि जो सिस्टम पहले से मौजूद हैं, वे जमीन पर कितने प्रभावी हैं? यही इस पूरी खबर का सबसे बड़ा सवाल है।
सरकार के पास सिस्टम(System) है, लेकिन क्या वह पर्याप्त है?
साइबर फ्रॉड(Cyber Fraud) से निपटने के लिए भारत में पिछले कुछ वर्षों में कई व्यवस्थाएं बनाई गई हैं। इंडियन साइबरक्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर यानी आई4सी, नेशनल साइबरक्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल और 1930 हेल्पलाइन जैसी व्यवस्थाएं इसी दिशा में काम करती हैं। इसके अलावा बैंक, पेमेंट कंपनियां और दूसरी वित्तीय संस्थाएं संदिग्ध ट्रांजैक्शन को पहचानने के लिए अलग-अलग फ्रॉड मॉनिटरिंग सिस्टम का इस्तेमाल कर रही हैं।
सरकार ने बैंकों और वित्तीय संस्थानों को साइबर फ्रॉड की शिकायतों पर तेजी से कार्रवाई करने के लिए सिस्टम से जोड़ने की कोशिश भी की है। संसदीय समिति की रिपोर्ट के मुताबिक, 350 से ज्यादा बैंक सिटिजन फाइनेंशियल साइबर फ्रॉड रिपोर्टिंग एंड मैनेजमेंट सिस्टम यानी सीएफसीएफआरएमएस से जुड़ चुके हैं। वहीं, 19 बैंकों ने आई4सी पोर्टल के साथ एपीआई इंटीग्रेशन पूरी तरह पूरा किया है।
लेकिन समिति की चिंता यही है कि इतने सिस्टम होने के बावजूद कवरेज अभी पूरी तरह व्यापक नहीं है। यानी सवाल यह नहीं है कि सिस्टम बनाया गया या नहीं। सवाल है—क्या हर बैंक, हर वित्तीय संस्था और हर जरूरी एजेंसी एक ही स्पीड से इस सिस्टम का हिस्सा बनी है?
साइबर फ्रॉड(Cyber Fraud) में असली लड़ाई है स्पीड की
साइबर फ्रॉड(Cyber Fraud) की दुनिया में सबसे महत्वपूर्ण चीज है, समय। मान लीजिए किसी व्यक्ति के खाते से अचानक ₹5 लाख निकल जाते हैं। अगर बैंक को इसकी जानकारी कुछ मिनटों के भीतर मिल जाती है और पैसा जिस खाते में गया है, उसे तुरंत फ्रीज कर दिया जाता है, तो पैसे को बचाने की संभावना काफी बढ़ जाती है।
लेकिन अगर यही जानकारी कुछ घंटे बाद मिलती है, तब तक पैसा कई खातों में घूम चुका हो सकता है। फ्रॉडस्टर अक्सर रकम को एक खाते से दूसरे खाते में तेजी से ट्रांसफर करते हैं। उसके बाद पैसा कई बार दूसरे बैंक, वॉलेट, पेमेंट प्लेटफॉर्म या अन्य माध्यमों तक पहुंच जाता है। यानी अपराधी का मॉडल कुछ ऐसा है- पैसा आया, तुरंत ट्रांसफर हुआ, दूसरा अकाउंट, तीसरा अकाउंट, पैसा गायब।
इसके मुकाबले सरकारी और बैंकिंग सिस्टम को शिकायत दर्ज करनी होती है, ट्रांजैक्शन की जांच करनी होती है, संबंधित बैंक से संपर्क करना होता है और फिर खाते को फ्रीज करना होता है। अगर इस पूरी प्रक्रिया में देरी हुई, तो पैसा निकल चुका होता है। इसीलिए साइबर फ्रॉड के खिलाफ असली मुकाबला सिर्फ टेक्नोलॉजी का नहीं, रिस्पॉन्स टाइम का भी है।
म्यूल अकाउंट(Mule Account) बना बड़ा हथियार
इस पूरी कहानी में एक और शब्द बहुत महत्वपूर्ण है, म्यूल अकाउंट। म्यूल अकाउंट वह बैंक अकाउंट होता है जिसका इस्तेमाल चोरी या फ्रॉड से मिले पैसे को आगे ट्रांसफर करने के लिए किया जाता है। फ्रॉडस्टर आमतौर पर पैसा सीधे अपने नाम के खाते में नहीं रखते। इसके लिए कई खातों का इस्तेमाल किया जाता है।
कभी किसी व्यक्ति को लालच देकर उसका बैंक अकाउंट इस्तेमाल किया जाता है। कभी फर्जी पहचान से अकाउंट खोले जाते हैं। कई मामलों में अकाउंट होल्डर को यह तक पता नहीं होता कि उसका खाता किसी साइबर अपराध में इस्तेमाल हो रहा है। यहीं पर सरकार और बैंकों के लिए चुनौती और बड़ी हो जाती है।
अगर किसी म्यूल अकाउंट की पहचान पैसा आने के बाद ही होती है, तो तब तक नुकसान हो चुका हो सकता है। इसीलिए संसदीय समिति ने म्यूलहंटर.एआई जैसे सिस्टम को बड़े स्तर पर इस्तेमाल करने की सिफारिश की है। फिलहाल इसका पायलट प्रोजेक्ट चार बैंक केनरा बैंक, पंजाब नेशनल बैंक, बैंक ऑफ बड़ौदा और बैंक ऑफ इंडिया में चलाया गया है। समिति ने इसके विस्तार की सिफारिश की है। यानी आने वाले समय में बैंकिंग सिस्टम को सिर्फ यह नहीं देखना होगा कि पैसा कहां गया। उसे यह भी पहचानना होगा कि कौन सा अकाउंट असामान्य तरीके से व्यवहार कर रहा है।

Image Source Google
एआई(AI) मदद कर सकता है, लेकिन अकेला समाधान नहीं है
आज साइबर सिक्योरिटी(Cyber security) की लगभग हर चर्चा में एआई का जिक्र होता है। और इसमें कोई शक नहीं कि एआई साइबर फ्रॉड की पहचान करने में काफी उपयोगी हो सकता है। अगर कोई व्यक्ति आमतौर पर ₹5,000 या ₹10,000 के ट्रांजैक्शन करता है और अचानक उसके खाते से लाखों रुपये अलग-अलग खातों में भेजे जाने लगें, तो मशीन लर्निंग मॉडल इस व्यवहार को तुरंत फ्लैग कर सकता है। लेकिन यहां एक समस्या है। सिर्फ एआई लगा देने से साइबर फ्रॉड खत्म नहीं होगा।
एआई को सही और पर्याप्त डेटा चाहिए। अलग-अलग बैंकों के बीच जानकारी शेयर करनी होगी। टेलीकॉम कंपनियों, पेमेंट कंपनियों, पुलिस और वित्तीय संस्थानों के बीच भी रियल-टाइम इंटेलिजेंस शेयरिंग जरूरी होगी। यानी साइबर सिक्योरिटी में सिर्फ टेक्नोलॉजी नहीं, कोऑर्डिनेशन भी उतना ही जरूरी है। इसीलिए समिति ने आरबीआई के डिजिटल पेमेंट इंटेलिजेंस प्लेटफॉर्म यानी डीपीआईपी के जल्द रोलआउट के लिए समयसीमा तय करने की सिफारिश की है।
सबसे बड़ा गैप: सभी बैंक(Bank) अभी एक जैसी स्थिति में नहीं
यही वह हिस्सा है जो इस खबर को बैंकिंग सेक्टर के लिए महत्वपूर्ण बनाता है। भारत में बड़े निजी और सरकारी बैंक तो अपनी साइबर सिक्योरिटी क्षमताओं पर लगातार निवेश कर रहे हैं। लेकिन छोटे बैंक और कोऑपरेटिव बैंक भी इसी डिजिटल सिस्टम का हिस्सा हैं।
अगर किसी एक छोटे बैंक का सिस्टम आई4सी या दूसरे फ्रॉड इंटेलिजेंस सिस्टम से पूरी तरह कनेक्ट नहीं है, तो अपराधी के लिए यह एक कमजोर कड़ी बन सकती है। इसीलिए संसदीय समिति ने सभी बैंकों, जिसमें छोटे और कोऑपरेटिव बैंक भी शामिल हैं, को एपीआई इंटीग्रेशन से जोड़ने और इसके लिए स्पष्ट समयसीमा तय करने की सिफारिश की है। यह बात इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि साइबर अपराधी पूरे बैंकिंग नेटवर्क की सबसे मजबूत कड़ी को नहीं, बल्कि सबसे कमजोर कड़ी को निशाना बना सकता है।
यह सिर्फ बैंकिंग सेक्टर(Banking System) की समस्या नहीं है
साइबर फ्रॉड(Cyber Fraud) को सिर्फ बैंक की समस्या मानना भी गलत होगा। एक फ्रॉड की शुरुआत अक्सर बैंक से नहीं होती। किसी व्यक्ति को फर्जी कॉल आ सकती है, फर्जी एसएमएस भेजा जा सकता है, व्हाट्सऐप पर लिंक आ सकता है, सोशल मीडिया पर नकली विज्ञापन दिखाई दे सकता है, किसी फर्जी वेबसाइट पर ले जाया जा सकता है।
इसके बाद बैंकिंग या यूपीआई सिस्टम का इस्तेमाल पैसा ट्रांसफर करने के लिए होता है। यानी एक ही फ्रॉड के पीछे टेलीकॉम कंपनी, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, बैंक, पेमेंट कंपनी और पुलिस के कई stakeholders हो सकते हैं। इसीलिए वैश्विक स्तर पर भी साइबर फ्रॉड से निपटने के लिए cross-sector coordination पर जोर बढ़ रहा है। मई 2026 की सीजीएपी रिपोर्ट भी बताती है कि आधुनिक डिजिटल फ्रॉड(Digital Fraud) में बैंक, टेलीकॉम कंपनियां, टेक प्लेटफॉर्म और सरकारी एजेंसियां एक-दूसरे के साथ रियल-टाइम इंटेलिजेंस शेयर करें, तभी रोकथाम ज्यादा प्रभावी हो सकती है।
जागरूकता जरूरी है, लेकिन जिम्मेदारी सिर्फ ग्राहक की नहीं
जब भी साइबर फ्रॉड की बात होती है, लोगों को सलाह दी जाती है कि ओटीपी शेयर न करें, अनजान लिंक पर क्लिक न करें और संदिग्ध कॉल से बचें। यह बिल्कुल जरूरी है। लेकिन यहां एक बड़ा सवाल भी है। अगर कोई व्यक्ति गलती से ठगी का शिकार हो गया, तो क्या पूरा बोझ उसी ग्राहक पर होना चाहिए?
संसदीय समिति की चिंता यही है कि सिस्टम को ऐसा बनाया जाए कि गलती होने के बाद भी नुकसान को सीमित किया जा सके। यानी अगर ग्राहक से फ्रॉड हो भी गया, तो सिस्टम को तुरंत संदिग्ध ट्रांजैक्शन पहचानना चाहिए, पैसे को फ्रीज करना चाहिए और रिकवरी की कोशिश शुरू करनी चाहिए। सिर्फ यह कहना कि “ग्राहक सावधान रहता तो फ्रॉड नहीं होता” पर्याप्त समाधान नहीं है।
डिजिटल इंडिया(Digital India) की अगली चुनौती
भारत ने डिजिटल पेमेंट में जिस तरह की सफलता हासिल की है, वह दुनिया के लिए भी एक बड़ा उदाहरण है। लेकिन अब इसी सफलता के साथ एक नई चुनौती सामने आ रही है। जितना ज्यादा पैसा डिजिटल होगा, उतना ही बड़ा साइबर फ्रॉड(Cyber Fraud) का संभावित बाजार भी होगा। इसलिए भारत की अगली डिजिटल क्रांति सिर्फ ज्यादा तेज पेमेंट या ज्यादा यूपीआई ट्रांजैक्शन की नहीं होनी चाहिए। यह ज्यादा सुरक्षित डिजिटल पेमेंट सिस्टम की भी होनी चाहिए। सरकार ने कई कदम उठाए हैं, लेकिन संसदीय समिति की आपत्ति यही याद दिलाती है कि सिस्टम बनाना और उसे हर जगह प्रभावी बनाना दो अलग बातें हैं।

Image Source Google
सबसे बड़ा बिजनेस इनसाइट
इस खबर को सिर्फ इस लाइन में समेटना आसान है कि “संसदीय समिति ने सरकार के जवाब को खारिज कर दिया।” लेकिन असली कहानी इससे कहीं बड़ी है। भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था अब इतनी बड़ी हो चुकी है कि साइबर सिक्योरिटी खुद आर्थिक सुरक्षा का हिस्सा बन गई है।
आज साइबर फ्रॉड(Cyber Fraud) में सबसे बड़ा मुकाबला है, अपराधी की स्पीड बनाम सिस्टम की स्पीड। अगर फ्रॉडस्टर कुछ सेकंड में पैसा निकाल सकता है, लेकिन बैंकिंग और कानून-व्यवस्था की प्रतिक्रिया में घंटे लगते हैं, तो सिस्टम हमेशा पीछे रहेगा। इसलिए आगे की रणनीति सिर्फ नए पोर्टल या नई हेल्पलाइन बनाने की नहीं होनी चाहिए।
जरूरत है रियल-टाइम डेटा शेयरिंग, सभी बैंकों का बेहतर इंटीग्रेशन, म्यूल अकाउंट की शुरुआती पहचान, एआई आधारित फ्रॉड डिटेक्शन, तेज फंड फ्रीजिंग और मजबूत केंद्र-राज्य समन्वय की। क्योंकि भारत ने डिजिटल पेमेंट को तेज बना दिया है। अब अगली चुनौती है-उसे उतना ही सुरक्षित और भरोसेमंद बनाना। और शायद इस पूरी खबर का सबसे बड़ा संदेश यही है, डिजिटल इंडिया की अगली लड़ाई टेक्नोलॉजी को अपनाने की नहीं, उस टेक्नोलॉजी पर लोगों का भरोसा बनाए रखने की है।
1991 Reforms: चेहरा मनमोहन सिंह(Manmohan Singh), लेकिन असली Mastermind कौन?