कूटनीति और बिज़नेस, दोनों अक्सर अलग-अलग रफ्तार से चलते हैं और भारत-चीन के मामले में तो ये फासला इस हफ्ते और साफ दिखने वाला है। चीनी राष्ट्रपति Xi Jinping इस हफ्ते नई दिल्ली पहुंचने वाले हैं, और खास बात ये है कि पिछले सात सालों में उनकी ये पहली भारत यात्रा होगी। मौका है BRICS समिट का, और उम्मीद यही जताई जा रही है कि इससे दोनों देशों के बीच जो थोड़ी बर्फ पिघली है, वो और पिघलेगी। पर सच्चाई ये भी है कि जितनी तेज़ी से डिप्लोमेसी आगे बढ़ रही है, बिज़नेस के मोर्चे पर उतनी ही रफ्तार से चीज़ें अटकी हुई हैं।
दिलचस्प बात ये है कि Xi Jinping की यात्रा को Beijing ने अभी तक आधिकारिक रूप से कन्फर्म नहीं किया है। और ये भी साफ नहीं कि Modi के साथ उनकी कोई अलग द्विपक्षीय मुलाकात होगी या सिर्फ समिट की औपचारिकता तक बात सीमित रहेगी। जबकि यही मुलाकात असल में तय करेगी कि आने वाले महीनों में रिश्ते किस दिशा में जाते हैं। दोनों नेता इस महीने की शुरुआत में किर्गिस्तान के एक क्षेत्रीय फोरम में एक-दूसरे से संक्षिप्त रूप से मिल चुके हैं, तो जान-पहचान तो है, पर उससे आगे की बात अभी बाकी है।
बिज़नेस अभी भी अटका हुआ क्यों है
यहां असली पेंच है। दोनों तरफ की कंपनियां लंबे समय से कुछ न कुछ रुकावटों से जूझ रही हैं कहीं रेगुलेटरी अप्रूवल में देरी, कहीं वीज़ा मिलने में महीनों का इंतज़ार, और कहीं इंडस्ट्रियल इक्विपमेंट के इंपोर्ट पर लगी पाबंदियां। ये तीनों मिलकर एक ऐसा माहौल बनाते हैं जहां दोनों देश एक-दूसरे से बात तो कर रहे हैं, पर भरोसा अभी भी कम है।
फुडान यूनिवर्सिटी के दक्षिण एशिया एक्सपर्ट लिन मिनवांग, जो पहले नई दिल्ली में चीनी दूतावास में डिप्लोमैट रह चुके हैं, इस पूरी स्थिति को एक लाइन में समेटते हैं चीन रिश्ते सुधारना चाहता है, ये तो साफ है, पर सवाल ये है कि भारत इसमें कितना साथ देने को तैयार है। उनका मानना है कि किसी बड़े नाटकीय बदलाव की उम्मीद फिलहाल कम ही है। वहीं ओआरएफ थिंक टैंक के हर्ष पंत का कहना है कि दोनों देशों के बीच भरोसे की कमी अभी भी काफी गहरी है, और ये सिर्फ एक मुलाकात या एक समिट से दूर होने वाली नहीं।

एक दिलचस्प मोड़ ये भी है कि चीनी कंपनियों के भारत में जो निवेश प्रस्ताव आ रहे हैं, उन्हें अब खुद बीजिंग पहले से ज़्यादा बारीकी से जांच रहा है खासकर उन सेक्टर्स में जहां हाई-एंड या सेंसिटिव टेक्नोलॉजी शामिल हो। मतलब सिर्फ भारत ही चीनी निवेश को शक की नज़र से नहीं देख रहा, चीन खुद भी अपनी कंपनियों पर लगाम कसे हुए है। और सूत्रों के मुताबिक, चीनी अधिकारियों ने अपनी कंपनियों से कहा है कि कुछ क्रिटिकल टेक्नोलॉजी भारत को न बेची जाए यानी जितनी बात “opportunity” की हो रही है, उतनी ही सावधानी परदे के पीछे भी बरती जा रही है।
भाषा नरम, ज़मीनी हकीकत अलग
चीन के विदेश मंत्रालय ने इस पर जो बयान दिया, वो सुनने में काफी सधा हुआ लगता है कि Xi और Modi दोनों एक-दूसरे को साझेदार मानते हैं, प्रतिस्पर्धी नहीं, और एक-दूसरे के लिए अवसर हैं, खतरा नहीं। कहने को ये लाइनें भरोसा जगाने वाली हैं, पर ज़मीन पर जो चल रहा है, वो इससे थोड़ा अलग तस्वीर दिखाता है।
कुछ और रिपोर्ट्स में इस घर्षण की छोटी-छोटी मिसालें भी सामने आई हैं। Dixon Technologies और Vivo के बीच जो जॉइंट वेंचर की बात चल रही थी, उस पर सवाल उठे हैं। BYD का भारत में निवेश प्लान फिलहाल टाल दिया गया है। Great Wall Motor भी लंबे समय से भारत में एंट्री की कोशिश कर रही है, पर बात अभी तक ठंडे बस्ते में ही पड़ी है। ये सब छोटी-छोटी घटनाएं लगती हैं, पर इन्हीं से असली तस्वीर बनती है कि सरकारी स्तर पर भले “साझेदारी” की भाषा बोली जा रही हो, कंपनी के स्तर पर हिचकिचाहट अभी भी बनी हुई है।
2020 की छाया अभी भी लंबी है
इस पूरी कहानी को समझने के लिए 2020 में गलवान में हुई सीमा झड़प को भुलाना मुश्किल है, जिसमें दोनों तरफ जानें गई थीं। उसके बाद से रिश्ते जिस निचले स्तर पर पहुंचे, वहां से ऊपर आना धीमा और मुश्किल रहा है। पिछले कुछ महीनों में सीमा पर तनाव थोड़ा कम ज़रूर हुआ है, फ्लाइट्स और कुछ वीज़ा कैटेगरी भी दोबारा शुरू हुई हैं, पर वो भरोसा जो 2020 से पहले था, वो अभी लौटा नहीं है। और शायद यही वजह है कि जब भी कोई बड़ी घोषणा होती है, विश्लेषक तुरंत जश्न मनाने की बजाय “देखते हैं आगे क्या होता है” वाला रुख अपनाते हैं।
भारतीय इंडस्ट्री की तरफ से नज़रिया अलग
इस पूरी तस्वीर का एक और पहलू है, जो अक्सर हेडलाइंस में कम आता है भारत के अंदर मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की अपनी चिंताएं। कई इंडियन कंपनियां, खासकर सोलर, इलेक्ट्रॉनिक्स और EV सप्लाई चेन में काम करने वाली, चीन से मशीनरी और कंपोनेंट्स पर काफी हद तक निर्भर हैं।
ऐसे में जब इंपोर्ट में देरी होती है या इंजीनियर्स के वीज़ा अटकते हैं, तो नुकसान सीधे प्रोडक्शन टाइमलाइन पर पड़ता है। यही वजह है कि इंडस्ट्री बॉडीज़ लगातार सरकार से कह रही हैं कि डिप्लोमैटिक सुधार को प्रैक्टिकल स्तर पर भी उतारा जाए यानी सिर्फ बयान नहीं, बल्कि वीज़ा प्रोसेसिंग तेज़ हो, अप्रूवल टाइमलाइन घटे। दूसरी तरफ, सुरक्षा और डेटा को लेकर सतर्कता भी अपनी जगह है, तो सरकार के लिए ये संतुलन बनाना आसान नहीं।

तो आगे क्या
BRICS समिट खुद एक बड़ा मंच है, जहां सिर्फ भारत-चीन ही नहीं, बाकी सदस्य देशों की भी नज़र इस मुलाकात पर रहेगी। अगर Modi और Xi की कोई सीधी बातचीत होती है, तो उसका असर सिर्फ डिप्लोमैटिक हलकों तक सीमित नहीं रहेगा बॉर्डर ट्रेड से लेकर टेक इंपोर्ट-एक्सपोर्ट तक, हर जगह इसका हल्का असर दिखेगा। पर अगर मुलाकात नहीं होती, या सिर्फ औपचारिक हाथ मिलाने तक सीमित रहती है, तो जो हालिया सुधार दिख रहे हैं, वो भी अटक सकते हैं।
फिलहाल के लिए इतना कहना सही रहेगा कि डिप्लोमेसी की गाड़ी आगे बढ़ रही है, थोड़ी धीमी सही। बिज़नेस की गाड़ी अभी भी वहीं खड़ी है, इंजन चालू है, पर हैंडब्रेक अभी तक नहीं खुला। और जब तक दोनों तरफ की कंपनियां एक-दूसरे पर उतना भरोसा नहीं करतीं जितना दोनों सरकारें बयानों में दिखा रही हैं, तब तक ये फासला यूं ही बना रहेगा।