अमेरिका की तरफ से एक बड़ा दावा सामने आया है। अमेरिकी Energy Secretary Chris Wright के मुताबिक, अमेरिकी military की मदद से एक ही दिन में 15 million barrels से ज्यादा oil और petroleum products Strait of Hormuz से बाहर निकाले गए। Pipelines से निकले तेल को जोड़ दें तो मंगलवार को Gulf region से बाहर जाने वाली कुल मात्रा करीब 20 million barrels रही। वहीं पिछले सात दिनों में Hormuz से बाहर निकलने वाला oil flow औसतन 8 million barrels per day से ज्यादा रहा।
पहली नजर में यह खबर राहत देती है लेकिन इसके पीछे की कहानी कहीं ज्यादा बड़ी है। क्योंकि अगर दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण oil check point से तेल निकालने के लिए US Navy की मदद लेनी पड़ रही है, तो इसका मतलब साफ है कि energy market अभी भी normal नहीं हुआ है।
पूरा मामला
Strait of Hormuz Persian Gulf को Arabian Sea से जोड़ने वाला बेहद महत्वपूर्ण maritime route है। Middle East के कई बड़े oil producers के लिए यही दुनिया तक crude oil पहुंचाने का प्रमुख रास्ता है। लेकिन Iran और अमेरिका के बीच लंबे समय से चल रहे conflict और बढ़ते तनाव ने इस route को बेहद risky बना दिया है। इसका असर oil shipments पर भी पड़ा International Energy Agency यानी IEA के मुताबिक, Gulf region से oil exports में भारी disruption हुआ है और 2026 में global oil supply पर इसका बड़ा असर पड़ा है।
जुलाई के अंत तक global observed oil inventories भी युद्ध शुरू होने के बाद से करीब 410 million barrels तक कम हो चुके थे। ऐसे माहौल में अमेरिका ने commercial vessels के लिए एक सुरक्षित maritime corridor तैयार करने और military assistance देने की कोशिश तेज कर दी।
अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, US military ने ships को Hormuz से सुरक्षित निकलने में मदद की है। अमेरिकी Navy और CENTCOM की मौजूदगी के बीच tankers को route कराया जा रहा है। यही वजह है कि मंगलवार को 15 million barrels से ज्यादा oil और petroleum products Hormuz के रास्ते बाहर निकले। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण बात समझनी होगी 15 million barrels का आंकड़ा एक दिन की movement है। सात दिन का average 8 million barrels/day से ज्यादा है।
यानी oil flow में सुधार जरूर हुआ है, लेकिन यह अभी भी उस स्थिति से काफी अलग है जिसमें global energy trade बिना किसी बड़े military intervention के सामान्य तरीके से चलता था। IEA के अनुसार, Hormuz disruption के कारण global oil supply, refinery operations और inventories पर पहले ही काफी दबाव आ चुका है। इसलिए इस खबर को “crisis खत्म” के रूप में देखना जल्दबाजी होगी। यह ज्यादा सही तरीके से “crisis के बीच supply corridor को बचाने की कोशिश” है।

सबसे बड़ा Geopolitical Angle
अब आते हैं इस खबर के सबसे दिलचस्प हिस्से पर, यह सिर्फ oil की कहानी नहीं है। यह geopolitical power game भी है। अमेरिका के लिए Strait of Hormuz को खुला रखना इसलिए जरूरी है क्योंकि अगर Iran इस route को लंबे समय तक effectively disrupt करता है, तो global energy supply पर बहुत बड़ा दबाव बन सकता है। दूसरी तरफ Iran के लिए Hormuz एक बेहद महत्वपूर्ण strategic leverage है।
यानी एक तरफ अमेरिका अपनी military capability के जरिए यह दिखाना चाहता है कि oil supply को पूरी तरह block नहीं होने दिया जाएगा, वहीं Iran यह साबित करना चाहता है कि region में उसकी strategic position अभी भी महत्वपूर्ण है। इसका एक economic dimension भी है जहां अमेरिका Iran पर economic pressure और sanctions बढ़ाने की तैयारी कर रहा है। Reuters के मुताबिक, Washington की नई sanctions strategy Iran और उसके trading partners, खासकर China, पर दबाव बढ़ाने वाली है। China Iranian oil का सबसे बड़ा buyer है।
इसलिए Hormuz सिर्फ shipping lane नहीं रह गया है। यह अब US-Iran economic warfare का एक central battlefield बन चुका है और सबसे बड़ी चुनौती यही है कि military presence oil flow को कुछ हद तक बनाए रख सकती है, लेकिन वह geopolitical uncertainty को खत्म नहीं कर सकती। अगर Iran और अमेरिका के बीच तनाव फिर बढ़ता है, vessels पर attacks बढ़ते हैं या shipping companies risk लेने से पीछे हटती हैं, तो आज का improved flow फिर गिर सकता है। यानी market को अब सिर्फ oil production नहीं, बल्कि security of transportation भी price करनी पड़ रही है।
Price में Changes
अब सबसे अहम सवाल, जिसका सीधा संबंध investors और consumers दोनों से है। Crude oil की कीमत पर इसका क्या असर पड़ेगा? इस खबर का immediate impact थोड़ा positive माना जा सकता है क्योंकि जब market देखता है कि Hormuz से oil निकल रहा है, तो supply shortage का डर थोड़ा कम होता है। लेकिन oil market अभी भी बेहद volatile है। IEA के मुताबिक, जुलाई में benchmark crude prices में करीब $40 per barrel की असाधारण wide range देखने को मिली। North Sea Dated crude जुलाई के अंत में $96.80 पर पहुंचा था और अगस्त में करीब $92 के आसपास trade कर रहा था।
18 अगस्त को Brent crude करीब $91.02 per barrel पर बंद हुआ था, जबकि WTI करीब $84.94 पर था उस समय भी market Iran-US tensions और Hormuz disruption को closely track कर रहा था। इसलिए आज की 15 million barrels वाली खबर crude prices के लिए short-term relief दे सकती है, लेकिन इसे permanent price reversal नहीं माना जा सकता। Market की अगली direction मुख्य रूप से तीन चीजों पर depend करेगी, पहला, Hormuz से daily oil flow कितना बढ़ता है, दूसरा, US-Iran tensions आगे किस दिशा में जाते हैं, तीसरा, global oil inventories कितनी तेजी से recover करती हैं।
अगर shipping लगातार बढ़ती है और diplomatic tension कम होती है, तो crude में pressure आ सकता है लेकिन अगर Hormuz फिर से effectively बंद होता है, तो supply fear वापस आ सकता है और crude prices में तेज उछाल देखने को मिल सकता है। यानी अभी oil market का सबसे बड़ा driver demand नहीं, geopolitics और supply security है।

भारत पर असर
अब इस पूरी कहानी का सबसे जरूरी हिस्सा भारत है। भारत दुनिया के बड़े oil-consuming देशों में शामिल है और अपनी crude oil जरूरत का बड़ा हिस्सा imports से पूरा करता है। इसलिए Middle East में supply disruption का असर भारतीय economy तक पहुंचना स्वाभाविक है। अगर Hormuz से oil flow बढ़ता है, तो भारत के लिए यह अच्छी खबर है। क्योंकि ज्यादा supply का मतलब है कि crude shortage का risk कम होगा और Indian refiners को alternative sources के लिए ज्यादा premium देने की जरूरत कम पड़ सकती है।
लेकिन अगर disruption लंबा चलता है, तो तस्वीर बदल सकती है। सबसे पहला असर crude import cost पर आएगा इसके बाद transportation और logistics costs बढ़ सकती हैं। Aviation fuel महंगा हो सकता है। Chemicals, plastics, manufacturing और कई energy-intensive industries पर cost pressure आ सकता है और अंततः इसका असर inflation पर पड़ सकता है। यही कारण है कि India इस crisis में अपने crude sourcing को diversify करने की कोशिश कर रहा है। हाल की reports के मुताबिक, Hormuz disruption के बीच India ने Latin America से crude imports बढ़ाए हैं और Venezuela एक महत्वपूर्ण alternative supplier के रूप में उभरा है। हालांकि लंबा shipping route transportation cost और transit time बढ़ाता है।
भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ oil खरीदना नहीं है, चुनौती है oil को affordable price पर और सुरक्षित route से भारत तक पहुंचाना। अगर crude लंबे समय तक 90-100 के आसपास बना रहता है, तो Indian economy के लिए pressure बढ़ सकता है। लेकिन अगर supply routes stabilize होते हैं और geopolitical risk premium कम होता है, तो India को राहत मिल सकती है।