Kanda Express – एक तस्वीर की कल्पना कीजिए जिसमें एक ट्रेन, रेल की पटरी पर दौड़ रही है लेकिन डिब्बों के अंदर कोई यात्री नहीं है। दूसरी तस्वीर में,नासिक की मंडी में हज़ारों बोरे प्याज़ के जमा हैं और तीसरी तस्वीर, जिसमे दिल्ली की एक गली में सब्ज़ी वाले की दुकान पर एक price board टंगा है 55 रुपये किलो का।
एक ही फ्रेम, तीन तस्वीरें और एक अजीब सा सवाल। सवाल ये कि आखिर एक सब्जी की कीमत इतनी बढ़ जाए कि सरकार उसके लिए पूरी ट्रेन दौड़ा दे तो सवाल प्याज़ का है, या सिस्टम का? क्योंकि इतिहास गवाह है प्याज़ सिर्फ किचन टेबल पे आँसू नहीं लेकर आता इसकी ऊँची कीमतों ने बहुत बार दिल्ली की policy table तक को रोने पे मजबूर किया है।
Kanda Express की शुरुआत क्यों हुई?
आज बात उस सब्जी की जिसे हम किलो-दो किलो खरीदकर घर लाते हैं, उसके लिए सरकार ने रेलवे का पूरा नेटवर्क क्यों activate कर दिया है। 24 अगस्त को केंद्र सरकार ने “Kanda Express” की घोषणा की इस रेल के जरिये नासिक से special railway rakes की मदद लेकर प्याज़ दिल्ली, चेन्नई, कोच्चि और गुवाहाटी जैसे शहरों तक भेजी जा रही है। अब ये तो Fact है लेकिन इसका असली मतलब क्या है? क्योंकि एक प्याज जब अपने उपर इतने layers रखती है तो उसकी बात इतनी सीधी कैसे हो सकती है।
इस घोषणा का मतलब यही है कि नासिक जैसे इलाकों में प्याज़ पड़ा हुआ है, लेकिन जिन शहरों में मांग सबसे ज़्यादा है, वहां तक वो समय पर नहीं पहुंच रहा। इसलिए सरकार को logistics का पूरा भार अपने कंधे पर लेना पड़ा और यह क्यों matter करता है? क्योंकि यह पहली बार नहीं है। 2024-25 में सिर्फ़ 14 रेक चली थीं, पांच शहरों तक। 2025-26 में ये बढ़कर 86 रेक और 16 शहर हो गया मतलब यह कोई emergency जुगाड़ नहीं यह अब एक स्थायी व्यवस्था बनती जा रही है।
प्याज़ अचानक महंगा क्यों हुआ?
Ministry के अपने आंकड़े कहते हैं 24 अगस्त को देश का औसत retail price लगभग साढ़े 43 (तितालिस) रुपये किलो था, पिछले साल के मुक़ाबले 59% ज़्यादा। लेकिन शहर-दर-शहर तस्वीर और डरावनी है दिल्ली में 55, चेन्नई में 60, और कहीं-कहीं 65 रुपये किलो तक अब यहां एक दिक्कत भी है। दिक्कत ये है कि देश में प्याज़ की कुल पैदावार में कोई बड़ी गिरावट नहीं आई। तो फिर कीमत इतनी क्यों बढ़ी? जवाब है देश में कुल प्याज़ पर्याप्त होना, और हर शहर में प्याज़ सस्ता होना, दो बिल्कुल अलग बातें हैं।
प्याज का सीज़न ऐसा है कि अगस्त-सितंबर में पुरानी फ़सल ख़त्म होने लगती है और नई फ़सल अभी आनी बाकी होती है। इसी gap में मंडी margins, transport lag, storage की कमी और त्योहारों की मांग सब मिलकर कीमत को ऊपर धकेल देते हैं। Supply वहां नहीं है, जहां demand है और यही Kanda Express के चलने कि असली वजह है।

Price Stabilisation Fund क्या है?
यह पूरी एक बनी-बनाई व्यवस्था का हिस्सा है जिसका नाम है Price Stabilisation Fund, यानी PSF। हर साल सरकार किसानों से सीधे प्याज़ खरीदती है, buffer stock बनाती है, और जब कीमत बढ़ती है, तो उसी stock को बाज़ार में उतार देती है। इस साल ये procurement price पांच बार बदली गई शुरुआत में 12 रुपये 70 पैसे किलो से, आख़िर में 21रुपये 25 पैसे प्रति किलो यानी 1,875 से बढ़कर 2,125 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गई और अगले सीज़न, 2026-27 के लिए, सरकार ने सिर्फ़ 2 लाख टन खरीदने का लक्ष्य रखा है जो पिछले साल के 3 लाख टन से कम है।
सरकार के सामने सबसे बड़ी दुविधा
सरकार के सामने असल में एक ऐसी पहेली है, जिसे हल करना लगभग नामुमकिन है। जब प्याज़ बहुत महंगा हो जाए तो consumer परेशान लेकिन अगर सरकार बहुत ज़्यादा stock एक साथ बाज़ार में उतार दे और कीमत धड़ाम से गिर जाए तो किसान परेशान इसलिए सरकार को दोनों के बीच एक ऐसा equilibrium ढूंढना पड़ता है, जो किसी को पूरी तरह खुश न करे, लेकिन किसी को पूरी तरह बर्बाद भी न करे और सच कहें तो, प्याज़ इतना important है कि जब इसकी कीमत बढ़ती है, तो सरकार को लगता है देश की economy में कुछ गड़बड़ है।
क्या Kanda Express सच में प्याज़ सस्ता करेगी?
Bulk onion तेज़ी से हिलता है जिन शहरों में कीमत सबसे ज़्यादा बढ़ी है, वहां supply जल्दी पहुंचती है। Regional असमानता कुछ हद तक कम होती है लेकिन limitations भी उतनी ही असली हैं। रेलवे सिर्फ़ शहर के station तक प्याज़ पहुंचा सकती है। उसके बाद mandi margin, loading-unloading cost, local transport, wastage और आख़िरी दुकान तक पहुंचने का खर्च ये सब मिलकर तय करता है कि consumer को असल में कितनी राहत मिलेगी। Train प्याज़ को शहर तक पहुंचा सकती है लेकिन दुकान तक पहुंचते-पहुंचते कितनी कीमत बचेगी यह पूरी chain तय करेगी।
लेकिन यहीं सबसे बड़ा twist अभी बाकी है। हर बार जब प्याज़ महंगा होता है, हम प्याज़ को दोष देते हैं। शायद असली problem प्याज़ में नहीं, उस network में है जो किसान और consumer के बीच खड़ा है fragmented मंडियां, कमज़ोर storage capacity, बुआई के बाद का नुकसान, demand का कमज़ोर अनुमान, और एक region से दूसरे region तक supply पहुंचाने में लगने वाली देरी। अगर हर price crisis के वक़्त train चलानी पड़े, तो शायद सवाल train का नहीं, network का है।
Kanda Express से बड़ा है असली सवाल
Kanda Express की कहानी सिर्फ़ एक ट्रेन की कहानी नहीं है यह उस सवाल की कहानी है कि सरकार कितनी बार market की problem को emergency intervention से संभाल सकती है और कब हमें उस system को ठीक करना पड़ेगा, जो बार-बार यह emergency पैदा करता है। क्योंकि प्याज़ की सबसे बड़ी layer शायद आख़िरी वाली है जिसे काटते हुए आंखों में पानी आता है और economy की आख़िरी layer शायद वह है, जिसे समझते हुए जेब से पैसा निकलता है।
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