2021 में टोक्यो ओलंपिक से लौटते वक्त नीरज चोपड़ा(Neeraj Chopra) के पास सिर्फ एक गोल्ड मेडल नहीं था, बल्कि पूरे देश का प्यार भी था। एथलेटिक्स में भारत का पहला ओलंपिक गोल्ड जीतकर लौटे नीरज(Neeraj) ने जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की, तो एक खास तोहफा भी साथ लेकर गए, वही भाला जिससे उन्होंने इतिहास रचा था। किसी को अंदाज़ा नहीं था कि यही भाला आगे चलकर एक दिलचस्प नीलामी की कहानी का हिस्सा बनेगा।
नीरज(Neeraj) उस ओलंपिक में भारत के इकलौते गोल्ड मेडलिस्ट थे। महिला हॉकी टीम चौथे नंबर पर रही थी, जबकि पुरुष हॉकी टीम ने चालीस साल से ज्यादा के लंबे इंतज़ार के बाद ब्रॉन्ज़ मेडल जीता था। ऐसे माहौल में नीरज(Neeraj) की जीत किसी त्योहार से कम नहीं लगी थी, और यही वजह थी कि उनका भाला भी भावनात्मक रूप से बाकी सारी चीज़ों से अलग बन गया।
टोक्यो से आया वो तोहफा
नीरज(Neeraj) ने अपना ओलंपिक वाला भाला प्रधानमंत्री को भेंट किया, जब मोदी ने टोक्यो से लौटे भारतीय एथलीट्स को सम्मानित करने के लिए एक कार्यक्रम रखा था। ये कोई अकेला तोहफा नहीं था। कई और खिलाड़ियों ने भी अपने-अपने खेल से जुड़ी यादगार चीज़ें प्रधानमंत्री को भेंट कीं। समय के साथ ऐसे तोहफों का एक बड़ा संग्रह जमा हो गया, और सरकार ने इन्हें नीलाम करने का फैसला लिया।

दरअसल प्रधानमंत्री के पास ऐसे तोहफों की नीलामी करने की ये पहली बार नहीं थी। इससे पहले 2019 में भी एक बड़ी नीलामी हो चुकी थी, जिसमें करीब 2,770 चीज़ें बिकी थीं, जिनमें पेंटिंग्स, मूर्तियां, शॉल, जैकेट और पारंपरिक वाद्य यंत्र शामिल थे। उस नीलामी से जुटाया गया पैसा भी नमामि गंगे मिशन को ही गया था। तो 2021 वाली नीलामी उसी परंपरा को आगे बढ़ाने का एक और मौका थी, बस इस बार खेल जगत से जुड़ी यादगार चीज़ों ने सबका ध्यान खींचा।
नीलामी की कहानी और वो 10 करोड़ वाला झटका
संस्कृति मंत्रालय के पोर्टल पर एक ई-नीलामी शुरू की, जो प्रधानमंत्री के 20 साल के राजनीतिक सफर के मौके पर रखी गई थी, ये सफर 2001 में गुजरात के मुख्यमंत्री बनने से शुरू हुआ था। इस तीसरे दौर की नीलामी में करीब 1,348 चीज़ें रखी गईं, और लोगों ने इसमें ज़बरदस्त दिलचस्पी दिखाई। कुल मिलाकर 8,600 से ज्यादा बोलियां लगाई गईं।
नीलामी की शुरुआत में ही एक हैरान करने वाली घटना हुई। पहले ही दिन नीरज(Neeraj) के भाले पर 10 करोड़ रुपये की बोली आ गई, इतनी बड़ी रकम देखकर सबकी नज़रें उसी पर टिक गईं। पर शाम होते-होते पता चला कि ये बोली संदिग्ध थी, शायद कोई फेक बिड थी, तो इसे रद्द कर दिया गया। आखिरकार जब नीलामी अपने अंजाम तक पहुंची, तो नीरज के भाले को सबसे ज्यादा, यानी 1.5 करोड़ रुपये की असली और मान्य बोली मिली। भाले की शुरुआती कीमत 1 करोड़ रुपये रखी गई थी, तो ये उससे भी ऊपर निकला।
आखिर किसने खरीदा वो भाला
काफी समय तक ये राज़ बना रहा कि इतनी बड़ी रकम देकर आखिर किसने ये भाला खरीदा। करीब एक साल बाद, 2022 में जाकर पता चला कि ये BCCI यानी भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड था, जिसने ये विजयी बोली लगाई थी। BCCI के एक अधिकारी ने बताया कि ये फैसला किसी निवेश की तरह नहीं, बल्कि देश के लिए कुछ करने की भावना से लिया गया था, क्योंकि नीलामी से जुटाया गया पैसा गंगा सफाई अभियान के लिए जा रहा था। BCCI ने इसके अलावा एक और चीज़ भी खरीदी, टोक्यो पैरालंपिक दल के हस्ताक्षर वाला एक अंगवस्त्र, जिसकी कीमत 1 करोड़ रुपये थी।
दिलचस्प बात ये भी है कि BCCI ने इससे पहले कोविड की पहली लहर के दौरान PM Cares फंड में 51 करोड़ रुपये का योगदान भी दिया था। मतलब बोर्ड के लिए ये कोई अकेली घटना नहीं थी, बल्कि राष्ट्रीय मौकों पर आर्थिक योगदान देने का एक सिलसिला था।
पैसा गया कहां
इस पूरी नीलामी से जुटाया गया पैसा किसी सरकारी खज़ाने में नहीं गया, बल्कि सीधे नमामि गंगे मिशन को दिया गया, जो गंगा नदी की सफाई और संरक्षण के लिए काम करता है। तीनों दौर की नीलामी मिलाकर करीब 1,300 से ज्यादा चीज़ें बिकीं, और कुल मिलाकर करीब 16 करोड़ रुपये जुटाए गए। मतलब खिलाड़ियों के जज़्बाती तोहफों ने आखिरकार एक बड़े पर्यावरणीय मकसद में योगदान दिया।
बाकी खिलाड़ियों के तोहफों की भी मिली अच्छी कीमत
नीरज(Neeraj) का भाला अकेला ऐसा तोहफा नहीं था जिसने ऊंची बोली खींची। फेंसर भवानी देवी की तलवार को 1.25 करोड़ रुपये मिले, पैरालंपियन सुमित अंतिल के भाले को करीब 1.002 करोड़ रुपये, और मुक्केबाज़ लवलीना बोरगोहेन के बॉक्सिंग ग्लव्स को 91 लाख रुपये। इनके अलावा सरदार पटेल की मूर्ति सबसे ज्यादा 140 बोलियां पाने में कामयाब रही, जबकि लकड़ी की गणेश प्रतिमा को 117 बोलियां मिलीं।
एक दिलचस्प ट्विस्ट भी है
इस पूरी कहानी में एक और मोड़ भी आता है। नीरज ने जो भाला प्रधानमंत्री को भेंट किया था, वो अलग था। जिस असली भाले से उन्होंने टोक्यो में गोल्ड मेडल जीता था, उसे उन्होंने बाद में स्विट्ज़रलैंड के लॉज़ान शहर में मौजूद ओलंपिक म्यूज़ियम को दान कर दिया, ताकि वो हमेशा के लिए खेल के इतिहास का हिस्सा बना रहे। मतलब एक भाले ने देश की सेवा में योगदान दिया, तो दूसरे ने खेल इतिहास में अपनी जगह बना ली, दोनों ही अपने-अपने तरीके से नीरज की उपलब्धि की याद दिलाते रहेंगे।

सोचकर देखिए, एक साधारण खेल उपकरण जिसकी कीमत सामान्य तौर पर शायद कुछ हज़ार रुपये से ज्यादा नहीं होती, वो किसी ओलंपिक चैंपियन के हाथों इस्तेमाल होते ही करोड़ों की चीज़ बन गया। यही वजह है कि खेल जगत की यादगार चीज़ों को कलेक्टर्स इतनी शिद्दत से खरीदना चाहते हैं, इनकी कीमत उस मेटल या मटीरियल में नहीं, बल्कि उस पल की कहानी में छुपी होती है जो उस चीज़ से जुड़ी होती है।
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