Mosquito 3D Printing:- मच्छर(Mosquito) का नाम सुनते ही ज़्यादातर लोगों के मन में सिर्फ खुजली, बीमारी और रात की नींद खराब होने वाला ख्याल आता है। पर कुछ वैज्ञानिकों ने इसी परेशान करने वाले जीव के एक अंग में ऐसी खूबी ढूंढ निकाली, जिसने उन्हें दुनिया के सबसे अनोखे साइंस अवॉर्ड तक पहुंचा दिया। यहां बात हो रही है मच्छर(Mosquito) के उस अंग की, जिससे वो हमारा खून चूसता है, और जिसे वैज्ञानिकों ने 3D प्रिंटिंग की दुनिया में एक नई मिसाल बना दिया।
सोचकर देखिए, जिस अंग से डर लगता है और जिससे बचने के लिए हम मच्छरदानी लगाते हैं, स्प्रे छिड़कते हैं, वही अंग किसी लैब में जाकर एक बेहद बारीक और सटीक औज़ार बन गया। ये कहानी सुनने में जितनी अजीब लगती है, विज्ञान की नज़र से उतनी ही दिलचस्प भी है।
Ig Nobel Prize है क्या चीज़
पहले थोड़ा समझ लीजिए ये प्राइज़ है क्या। Ig Nobel Prize हर साल उन खोजों को दिया जाता है जो पहली नज़र में अजीब या मज़ाकिया लगती हैं, पर असल में उनके पीछे गंभीर विज्ञान छुपा होता है। इस साल की 36वीं सेरेमनी 3 सितंबर 2026 को स्विट्ज़रलैंड के ज़्यूरिख शहर में हुई। इस बार तिलचट्टों के दूध में मिलने वाले हैरान करने वाले प्रोटीन से लेकर, मिट्टी की सेहत मापने के लिए हज़ार जोड़ी अंडरवियर इस्तेमाल करने तक, कई अजीबोगरीब खोजों को सम्मानित किया गया।
इस अवॉर्ड की सबसे अच्छी बात यही है कि ये विज्ञान को हल्के-फुल्के अंदाज़ में पेश करता है, बिना उसकी गंभीरता कम किए। हर साल दुनियाभर के रिसर्चर अपनी ऐसी खोजें सामने लाते हैं, जो सुनने में भले ही मज़ाक जैसी लगें, पर जिनके पीछे कई साल की मेहनत और असली वैज्ञानिक तरीका छुपा होता है। यही कॉम्बिनेशन इस अवॉर्ड को बाकी सारे साइंस अवॉर्ड्स से अलग बनाता है।
मच्छर(Mosquito) का वो अंग जो बना नोज़ल
इस साल का Technology Prize जीता उन वैज्ञानिकों ने, जिन्होंने 3D प्रिंटिंग का एक बिल्कुल नया तरीका खोज निकाला, वो भी मच्छर(Mosquito)को उल्टा करके। McGill University के मैकेनिकल इंजीनियर Changhong Cao और बायोइंजीनियर Jianyu Li की अगुवाई वाली टीम ने पाया कि मच्छर के खून चूसने वाले अंग, यानी proboscis, को एक बेहद बारीक 3D प्रिंटिंग नोज़ल के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है। उन्होंने इस नए तरीके को नाम दिया “3D necroprinting”।

Cao ने बताया कि मच्छर(Mosquito) के इस अंग से इतनी छोटी और बारीक संरचनाएं छापी जा सकती हैं, जिन्हें सामान्य औज़ारों से बनाना या तो मुश्किल होता है या बेहद महंगा। और चूंकि ये बायोलॉजिकल नोज़ल खुद ब खुद मिट्टी में घुल जाते हैं, तो जो मटेरियल आमतौर पर फेंक दिया जाता, उसे दोबारा इस्तेमाल में लाया जा सकता है।
पहले तलाशे गए दूसरे विकल्प
टीम सीधे मच्छर(Mosquito) पर नहीं पहुंची, बल्कि पहले उन्होंने प्रकृति में मौजूद ढेर सारे विकल्प खंगाले। सांप के दांत, बिच्छू के डंक, पौधों की नसें जिन्हें xylem कहा जाता है, यहां तक कि बेडबग और सेटसी फ्लाई जैसे कीड़ों के मुंह के अंगों को भी परखा गया। असली अच्छा 3D प्रिंटिंग नोज़ल बनने के लिए किसी चीज़ में बहुत कम मोड़, मज़बूती और सख्ती होनी चाहिए। इतनी छानबीन के बाद टीम मादा मच्छर(Mosquito) के proboscis पर आकर रुकी, जिसकी लंबाई सिर्फ 2 मिलीमीटर होती है, पर उसमें ये सारी खूबियां एक साथ मौजूद थीं।
मच्छर(Mosquito) के अंग से आखिर छपाई कैसे हुई
इस पूरे सिस्टम को बनाने के लिए टीम ने मच्छर(Mosquito) के proboscis को एक सामान्य 3D प्रिंटर की dispense tip के साथ जोड़ा, और फिर टेस्ट किया कि ये कितना दबाव झेल सकता है और कितनी रफ्तार से बायो-इंक निकाल सकता है। नतीजा हैरान करने वाला था, इस नोज़ल से वो सिर्फ 20 माइक्रोमीटर तक पतली लाइनें छाप पाए, जो बाज़ार में मिलने वाले सबसे बारीक कमर्शियल 3D प्रिंटिंग टिप से भी करीब ढाई गुना ज्यादा बारीक है।
किस-किस चीज़ की छपाई की गई
इस सिस्टम का इस्तेमाल करके टीम ने कई बारीक चीज़ें छापीं, जैसे मधुमक्खी के छत्ते जैसा हेक्सागोनल पैटर्न, मेपल के पत्ते का आकार, और इतने छोटे बायोस्कैफोल्ड, जिनमें कैंसर सेल्स और लाल रक्त कोशिकाओं तक को अलग-अलग रखा जा सका। मतलब ये सिर्फ किसी कलात्मक शक्ल छापने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि जीवित कोशिकाओं जैसी नाज़ुक चीज़ों के साथ भी सटीक ढंग से काम कर सका।
दवा पहुंचाने के काम भी आया
सबसे दिलचस्प बात ये है कि इस सिस्टम को एक ड्रग डिलीवरी सेटअप की तरह भी इस्तेमाल किया जा सकता है। टीम ने एक मॉडल दवा को पिकोमोलर, यानी बेहद ही कम, मात्रा में सुअर की त्वचा में इंजेक्ट करके दिखाया कि ये तकनीक भविष्य में सटीक दवा पहुंचाने के काम भी आ सकती है। बायोइंजीनियर Jianyu Li ने बताया कि इस तरह के जैविक पदार्थों को जटिल इंजीनियर्ड कलपुर्ज़ों के बदले इस्तेमाल करके, ये काम टिकाऊ और नए तरीकों का रास्ता खोलता है, चाहे वो एडवांस मैन्युफैक्चरिंग हो या माइक्रोइंजीनियरिंग।
आखिर में बात इतनी सी है
ये पूरी कहानी बताती है कि विज्ञान कभी-कभी सबसे अनचाही जगहों से भी कुछ बेहद काम की चीज़ ढूंढ निकालता है। जिस मच्छर(Mosquito) को हम सिर्फ भगाने या मारने की कोशिश करते हैं, उसी के शरीर के एक हिस्से ने आगे चलकर मेडिकल रिसर्च और मैन्युफैक्चरिंग की दुनिया में एक नया दरवाज़ा खोल दिया। शायद यही वजह है कि Ig Nobel Prize जैसे अवॉर्ड्स इतने खास होते हैं, ये हमें याद दिलाते हैं कि हंसी और गंभीर विज्ञान हमेशा एक-दूसरे के विरोधी नहीं होते, कई बार दोनों साथ-साथ भी चल सकते हैं।

आगे चलकर हो सकता है कि इसी तरह के बायो-हाइब्रिड औज़ार मेडिकल लैब्स और मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स का एक आम हिस्सा बन जाएं, जहां प्राकृतिक और सस्ती चीज़ें महंगे इंजीनियर्ड पार्ट्स की जगह ले लें। और जब भी अगली बार कोई मच्छर(Mosquito) आपके कान के पास भिनभिनाए, हो सकता है आप उसे सिर्फ एक परेशान करने वाला कीड़ा नहीं, बल्कि एक छोटा सा जैविक अजूबा भी समझें, जिसमें छुपी है इतनी बारीक इंजीनियरिंग कि उसे नकल करना भी इंसान के लिए आसान नहीं।