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1991 Reforms: चेहरा मनमोहन सिंह(Manmohan Singh), लेकिन असली Mastermind कौन?

एक किरदार, जिसे शायद आप नहीं जानते। एक ऐसा शख़्स, जो मनमोहन सिंह की चमक में कहीं पीछे छूट गया। 1991 की तस्वीर ज़रा याद कीजिए। भारत की अर्थव्यवस्था गहरे संकट में थी। विदेशी मुद्रा भंडार इतना कम हो चुका था कि देश के पास मुश्किल से कुछ हफ्तों के आयात के लिए पैसा बचा था। एक तरफ़ सोना गिरवी रखने की नौबत थी और दूसरी तरफ़ देश की अर्थव्यवस्था उस पुराने ढाँचे के बोझ से दब चुकी थी, जिसमें उद्योग लगाने से लेकर व्यापार करने तक सरकार की इजाज़त ज़रूरी थी। फिर आया जुलाई 1991। 

संसद में एक शांत, गंभीर चेहरा खड़ा हुआ-डॉ. मनमोहन सिंह। उनके Budget Speech ने भारतीय अर्थव्यवस्था की दिशा बदल दी। License Raj को चुनौती मिली, व्यापार के दरवाज़े खुले, विदेशी निवेश के लिए रास्ते बने और भारत ने धीरे-धीरे उस आर्थिक मॉडल से बाहर निकलना शुरू किया, जिसमें राज्य लगभग हर आर्थिक फैसले का मालिक था। और यहीं से इतिहास ने एक नाम याद रखा-मनमोहन सिंह। लेकिन कहानी में एक ऐसा आदमी भी था, जिसका नाम इस कहानी के सबसे महत्वपूर्ण अध्यायों में होना चाहिए था।

वह संसद में नहीं खड़ा था। उसने कोई ऐतिहासिक Budget Speech नहीं दिया। उसके नाम पर कोई मशहूर नारा नहीं बना। लेकिन 1991 से एक साल पहले ही वह भारत के आर्थिक बदलाव का एक ऐसा नक्शा तैयार कर चुका था, जिसमें उन reforms की कई बुनियादी बातें मौजूद थीं, जिन्हें बाद में 1991 में लागू किया गया। उस आदमी का नाम था-मोंटेक सिंह अहलूवालिया।

कौन थे मोंटेक सिंह अहलूवालिया(Montek Singh Ahluwalia)और कैसे पहुंचे Economic Policy के केंद्र में? 

मोंटेक अहलूवालिया(Montek Ahluwalia) की कहानी किसी अचानक उभरे हुए bureaucrat की कहानी नहीं है। उन्होंने Oxford में पढ़ाई की, Rhodes Scholar रहे और World Bank में काम किया। 1979 में भारत लौटे और आर्थिक नीति के उस तंत्र का हिस्सा बने, जहाँ देश की आर्थिक दिशा पर फैसले लिए जाते थे। 1980s में जब भारत के भीतर धीरे-धीरे यह सवाल उठने लगा कि क्या वही पुराना License Raj, ऊँची tariffs, सरकारी नियंत्रण और inefficient public sector भारत को तेज़ विकास दे सकते हैं, तब अहलूवालिया उन लोगों में थे जो इस सवाल को गंभीरता से उठा रहे थे। और फिर आया 1990। 

तत्कालीन प्रधानमंत्री वी. पी. सिंह के कार्यकाल में अहलूवालिया(Ahluwalia) ने एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ तैयार किया-“Towards a Restructuring of Industrial, Trade, and Fiscal Policies”, जिसे बाद में “M Document” के नाम से जाना गया। इस document में कोई एक isolated reform नहीं था, बल्कि एक पूरी economic architecture की बात थी-industrial licensing को कम करना, public sector की भूमिका और efficiency पर सवाल उठाना, protectionism घटाना, foreign investment के लिए रास्ते खोलना, trade policy बदलना और fiscal तथा macroeconomic balance को सुधारना। यानी आज जब हम 1991 की LPG reforms-Liberalisation, Privatisation और Globalisation-की बात करते हैं, तो उसके कई बुनियादी विचार 1991 के Budget से पहले ही सरकारी दस्तावेज़ में मौजूद थे।

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M Document:1991 Economic Reforms का Blueprint

लेकिन उस वक्त एक समस्या थी-ideas तैयार थे, लेकिन political will नहीं थी। M Document सामने आया, उसकी चर्चा हुई, लेकिन वी. पी. सिंह की सरकार खुद राजनीतिक संकट में फंस गई और जल्द ही सत्ता से बाहर हो गई। यानी भारत के आर्थिक बदलाव का एक blueprint मौजूद था, लेकिन उसे लागू करने वाला political moment अभी आया नहीं था। फिर आया 1991। पी. वी. नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बने। देश आर्थिक संकट में था और इसी समय मोंटेक अहलूवालिया Commerce Secretary थे।

यानी जिस समय भारत trade reforms की तरफ़ बढ़ रहा था, वह उस machinery के भीतर मौजूद थे जो इन reforms को लागू कर रही थी। इसके बाद वह Finance Ministry पहुँचे-पहले Secretary, Department of Economic Affairs और फिर Finance Secretary। यानी जिस economic transformation को हम आज एक Budget Speech से याद करते हैं, उसके पीछे बनने वाली policy machinery में अहलूवालिया लगातार मौजूद थे।

मनमोहन सिंह बने Reforms का चेहरा, लेकिन अहलूवालिया रहे Backstage 

लेकिन फिर सवाल आता है-अगर अहलूवालिया इतने महत्वपूर्ण थे, तो इतिहास में मनमोहन सिंह का नाम इतना बड़ा क्यों हो गया? इसका जवाब शायद बहुत सरल है। क्योंकि इतिहास अक्सर ideas लिखने वाले को नहीं, उन्हें जनता के सामने प्रस्तुत करने वाले को याद रखता है। 24 जुलाई 1991 को संसद में मनमोहन सिंह ने Budget पेश किया। कैमरे उन्हीं पर थे, संसद उन्हीं को सुन रही थी, देश उन्हीं का भाषण सुन रहा था और वही व्यक्ति भारत के economic transformation का चेहरा बन गया। 

मोंटेक अहलूवालिया? वह backstage में थे। और शायद यही वजह है कि उनकी अपनी किताब का नाम भी है-Backstage: The Story Behind India’s High Growth Years. विडंबना देखिए-जिस व्यक्ति ने 1990 में एक integrated reform strategy लिखी थी, उसी कहानी में वह खुद backstage रह गया, और जिस व्यक्ति ने 1991 में Parliament के सामने उस बदलाव को प्रस्तुत किया, वह इतिहास के सबसे प्रसिद्ध economic reformers में शामिल हो गया।

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नरसिम्हा राव, अहलूवालिया और मनमोहन सिंह: 1991 की असली Reform Story

लेकिन यहाँ एक बात साफ़ करना ज़रूरी है। इस कहानी को यह कहकर पेश करना गलत होगा कि “असल reforms अहलूवालिया ने किए और मनमोहन सिंह ने सिर्फ़ credit लिया।” इतिहास इतना आसान नहीं है। मनमोहन सिंह की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण थी। वह Finance Minister थे, उन्होंने Budget को राजनीतिक और आर्थिक रूप से defend किया, reforms को संसद और देश के सामने प्रस्तुत किया और पूरे कार्यक्रम को credibility दी। और प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिम्हा राव की भूमिका तो और भी महत्वपूर्ण थी-क्योंकि किसी भी reform को लागू करने के लिए सिर्फ़ economist नहीं, political authority भी चाहिए होती है। 

इसलिए 1991 की कहानी को शायद एक व्यक्ति की कहानी की तरह नहीं, बल्कि तीन लोगों की कहानी की तरह देखना चाहिए। नरसिम्हा राव-जिन्होंने राजनीतिक दरवाज़ा खोला। मोंटेक अहलूवालिया-जिन्होंने reform architecture तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। और मनमोहन सिंह-जिन्होंने Finance Ministry से उस बदलाव को नेतृत्व दिया और देश के सामने उसकी सबसे स्पष्ट सार्वजनिक आवाज़ बने।

यही वजह है कि 1991 को सिर्फ़ “Manmohan Singh’s reforms” कहना अधूरा है। और इसे सिर्फ़ “Montek Ahluwalia’s blueprint” कहना भी अधूरा है। असल कहानी इससे कहीं ज्यादा दिलचस्प है, क्योंकि economic reforms किसी एक दिन पैदा नहीं होते। वे वर्षों तक दिमागों में बनते हैं, फाइलों में लिखे जाते हैं, Cabinet rooms में बहस होते हैं, कुछ ideas reject होते हैं, कुछ राजनीतिक परिस्थितियों का इंतज़ार करते हैं और फिर एक दिन, जब देश संकट में होता है और पुरानी व्यवस्था खुद अपने वजन से टूटने लगती है, वही पुराने ideas अचानक revolutionary लगने लगते हैं। 1990 में M Document शायद सिर्फ़ एक सरकारी paper था। 1991 में वही सोच भारत की economic transformation का हिस्सा बन गई।

और आज, जब हम उस transformation को याद करते हैं, तो Parliament में खड़े मनमोहन सिंह का चेहरा दिखाई देता है। लेकिन उस तस्वीर के frame के बाहर एक और आदमी खड़ा था-मोंटेक सिंह अहलूवालिया। वह आदमी जिसने बदलाव की घोषणा नहीं की थी, लेकिन बदलाव आने से पहले ही उसका नक्शा कागज़ पर खींच दिया था। और शायद इतिहास की सबसे बड़ी विडंबना यही है-जिस आदमी ने भारत के आर्थिक बदलाव की कहानी लिखने में मदद की, वह खुद उस कहानी का सबसे कम दिखाई देने वाला किरदार बन गया।

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