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PM CARES Fund: पैसा कहाँ से आया, और कहाँ गया?

PM CARES Fund:- सोचिए – देशवासियों ने इमरजेंसी के लिए हजारों करोड़ दान दिए थे। नतीजा क्या निकला? ऑडिट रिपोर्ट कहती है, PM CARES में ₹8,452 करोड़ जमा हैं, लेकिन खर्च हुए सिर्फ 87 लाख। सवाल उठता है: पैसा गया कहाँ? आखिर इन सारे पैसों को यूज़ क्यूँ नहीं किया गया? सरकार किस इमरजेंसी के इंतज़ार में है इसे इस्तेमाल करने के लिए? और अगर इसे सही तरीके से इस्तेमाल करते तो देश में क्या बदल जाता? क्या इन पैसों का अंजाम भी राम मंदिर के चंदे जैसा होता या किसी गरीब का सच में भला हो जाता।

सवाल एक ही है: पैसा कहाँ से आया, और कहाँ गया? पहले समझ लेते हैं ये कोष है क्या। PM CARES – पूरा नाम प्राइम मिनिस्टर्स सिटिजन असिस्टेंस एंड रिलीफ इन इमरजेंसी सिचुएशंस – मार्च 2020 में कोविड आपदा के दौरान बना। ट्रस्ट का अध्यक्ष खुद प्रधानमंत्री हैं; रक्षा, गृह और वित्त मंत्री साथ में सदस्य। सरकार का कहना है फंड पूरी तरह दान से चलता है, बजट से एक रुपया नहीं आता – इसी आधार पर इसे आरटीआई और सीएजी के दायरे से बाहर रखा गया है।

पहला झटका

कोष के पास अभी ₹8,452.06 करोड़ पड़े हैं। ये टैक्सपेयर का पैसा नहीं है, ध्यान रहे – ये दान से बना फंड है, फिर भी रकम इतनी बड़ी है कि आंकड़ा देखकर रुकना पड़े। तकरीबन 93% फिक्स्ड डिपॉज़िट में पड़ा है, बाकी ₹605.41 करोड़ बचत खाते में। जैसे किसी ने खज़ाना गाड़कर रख दिया हो। पूरे वित्त वर्ष 2024-25 में फंड ने खर्च किए सिर्फ ₹87 लाख – यानी ₹8,452 करोड़ के कोष का महज़ 0.01%।

इसमें से ₹87.84 लाख गए पीएम केयर्स फॉर चिल्ड्रेन योजना पर, और ₹451 बैंक व एसएमएस चार्ज में। बाकी सब जस का तस। असल में आंकड़ा यही है – 8,452.06 करोड़ में से खर्च हुए ठीक 87 लाख। बाकी सब खाते में जमा पड़ा है वो भी एफडी यानी फिक्स्ड डिपॉज़िट में, तो कुल मिलाकर पैसा तो है लेकिन एक ऐसे तिजोरी में, जिसमें सील लगी हो।

एफवाई25 में कोष को ₹324.66 करोड़ वापस मिले, यानी जिन एजेंसियों को पैसा दिया गया था, उन्होंने ही लौटा दिया। इसी साल दान आया करीब ₹480 करोड़, और सिर्फ ब्याज से कमाई हुई करीब ₹475 करोड़। लगभग बराबर – जैसे किसी दुकान पर ₹480 का सामान लेने गए और बिल ₹475 का ही कट गया। हो सकता है कोई कहे – “ब्याज से फायदा तो हो ही रहा है।” लेकिन सवाल वही रहता है: ये पैसा तो अस्पतालों और मरीज़ों तक पहुँचना था। इतनी बड़ी रकम कोष में बंद करके रखने का मक़सद आख़िर क्या है?

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कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियंक खरगे ने एक्स पर लिखा – 8,452 करोड़ में से महज़ 0.01% खर्च हुआ, बाकी रकम यूं ही पड़ी है; पोस्ट ख़त्म हुई एक तीखे सवाल के साथ: “पीएम केयर्स? हार्डली.” उन्होंने इसे सरकार का सबसे बड़ा “इंस्टीट्यूशनल स्कैम” तक कह दिया।

एक्टिविस्ट अंजलि भारद्वाज ने भी सवाल उठाया – ₹324 करोड़ का रिफंड आया कहाँ से, किस एजेंसी ने लौटाया, किस प्रोजेक्ट के लिए था, कुछ भी साफ नहीं। जवाब हमें भी चाहिए – ऑडिट रिपोर्ट में यूडीआईएन क्यों नहीं है? वो नोट्स कहां हैं जो बताते कि पैसा असल में गया कहां?

अगर पैसा खर्च होना है, तो जाए कहां?

यहां एक दिलचस्प आवाज़ जुड़ी है। कॉकरोच जनता पार्टी के फाउंडर अभिजीत दीपके ने ऑडिट रिपोर्ट आने के अगले ही दिन सुझाव दिया कि इस पैसे से देश के सरकारी स्कूलों की हालत बदली जा सकती है – उनकी “स्कूल ठीक करो” मुहिम का कहना है कि इतने पैसे में 1,000 से ज़्यादा हाई-टेक मॉडल स्कूल बन सकते हैं, गांव के स्कूलों में सड़क, बेंच और पीने का पानी जैसी बुनियादी चीज़ें ठीक हो सकती हैं। दीपके का सवाल सीधा था: “पीएम को दिखाना चाहिए कि वो सच में केयर करते हैं।” सरकार के समर्थकों ने इसे “नौटंकी” कहकर खारिज कर दिया – उनका कहना है, Fund सिर्फ इमरजेंसी और आपदा राहत के लिए है, स्कूलों के लिए नहीं।

इसी साल जुलाई-अगस्त में असम में आई बाढ़ ने 100 से ज़्यादा जानें ले लीं, लाखों लोग बेघर हुए, हज़ारों गांव डूबे। हाल के बरसों में केरल और हिमाचल प्रदेश भी बड़ी बाढ़ झेल चुके हैं। अगर PM CARES सच में “इमरजेंसी के लिए बचाया गया फंड” है, तो सवाल लाज़मी है – इससे बड़ी इमरजेंसी और कहां मिलेगी? स्कूल हों या बाढ़-राहत – पैसा मौजूद है, ज़रूरत भी मौजूद है। बस दोनों को जोड़ने वाली कड़ी कहीं गुम है।

सरकार का पक्ष

क्योंकि सरकार भी यही कहती है कि – ये कोष इमरजेंसी के लिए बचाकर रखा गया है। महामारी के दौरान वैक्सीन और राहत पर पहले ही बड़ी रकम खर्च हो चुकी है। बाकी पैसा असली संकट के लिए है, और तब तक ब्याज से ही कमाई हो रही है तो नुकसान किसी को नहीं। अदालत में भी सरकार यही कह चुकी है – PM CARES एक ट्रस्ट है, इसलिए इस पर आरटीआई और सीएजी लागू नहीं होते।

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निष्कर्ष

यानी बात पूरी तरह क़ानूनी है – बस जवाबदेही कहीं गुम है, और आंकड़े चुप। तो, PM CARES Fund की ऑडिट रिपोर्ट से यही कहानी निकलकर आई – ₹8,452 करोड़ जमा, खर्च सिर्फ लाखों का, यानी 0.01%। ये पैसा सुरक्षित रखा है, या बस अटका पड़ा है – फ़ैसला आपका।

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