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Fevicol: वो ब्रांड जिसने “गोंद” शब्द को ही अपना नाम बना दिया

एक छोटा सा टेस्ट कीजिए। अगली बार जब आपको कुछ चिपकाना हो, जरा गौर कीजिए कि आपके दिमाग में सबसे पहला शब्द क्या आता है। ज्यादातर लोगों के लिए जवाब एक ही होगा, Fevicol। दिलचस्प बात यह है कि “एडहेसिव” या “गोंद” जैसे शब्द भले ही तकनीकी रूप से सही हों, लेकिन आम बोलचाल में इनकी जगह पूरी तरह एक ब्रांड नेम ने ले ली है। किसी प्रोडक्ट का इतना गहरा असर होना, कि वह पूरी कैटेगरी का पर्यायवाची बन जाए, यह किसी करिश्मे से कम नहीं। और इस करिश्मे के पीछे की कहानी उतनी ही दिलचस्प है जितना खुद यह ब्रांड।

एक चपरासी से “Fevicol Man” तक का सफर

इस कहानी की शुरुआत गुजरात के एक छोटे से गांव महुआ से होती है, जहां बलवंत पारेख का जन्म हुआ था। शुरुआती दिनों में हालात इतने तंग थे कि वे एक लकड़ी के व्यापारी के यहां चपरासी का काम करते थे, और अपनी पत्नी के साथ उसी लकड़ी के गोदाम में रहने को मजबूर थे।

लेकिन यहीं, उसी गोदाम में काम करते हुए, उन्होंने एक ऐसा मार्केट गैप पहचाना जिसे बाकी किसी ने गंभीरता से नहीं लिया था। 1959 में उन्होंने Fevicol लॉन्च किया और पिडीलाइट इंडस्ट्रीज़ की नींव रखी। आज उन्हें प्यार से “Fevicol Man” कहा जाता है, लेकिन उनकी असली प्रतिभा सिर्फ एक बढ़िया प्रोडक्ट बनाने में नहीं थी, उनकी असली काबिलियत यह थी कि उन्होंने उस प्रोडक्ट को हर भारतीय के दिल तक कैसे पहुंचाया।

जब Fevicol बाजार में उतरा, तो कंपनी के पास ना बड़ा बजट था, ना कोई पहचान। कारपेंटर पुराने जमाने के जानवरों से बने गोंद के आदी थे, और जो लोग थोड़े संपन्न थे, वे इंपोर्टेड चीजों को ही असली और भरोसेमंद मानते थे। ऐसे में Fevicol को एक सस्ता, लोकल प्रोडक्ट समझकर नजरअंदाज कर दिया जाना लाजमी था।

जब विज्ञापन का बजट न हो, तो भरोसा बेचो

यहीं से इस कहानी का सबसे दिलचस्प मोड़ शुरू होता है। पिडीलाइट के पास टीवी या रेडियो पर बड़े-बड़े विज्ञापन चलाने के लिए पैसे नहीं थे। तो बलवंत पारेख ने एक बिल्कुल अलग रास्ता चुना उन्होंने प्रोडक्ट बेचने से पहले भरोसा बेचना शुरू किया। वे खुद दुकानदारों और कारपेंटरों से मिलने जाते, उनके लिए डेमो वर्कशॉप लगाते, जहां लोगों के सामने ही दिखाया जाता कि Fevicol बिना गर्म किए, बिना बदबू के, मक्खन जैसी स्मूदनेस के साथ चीजों को कैसे जोड़ देता है। फ्री सैंपल बांटे गए, ताकि कारीगर खुद इस्तेमाल करके भरोसा करें, ना कि किसी विज्ञापन की बात पर आंख मूंदकर यकीन करें।

यह रणनीति आज भी मार्केटिंग की एक बड़ी सीख है अगर किसी प्रोडक्ट पर सच में भरोसा दिलाना है, तो लोगों को खुद उसे अनुभव करने का मौका दीजिए। कोई भी विज्ञापन उतना असरदार नहीं होता जितना खुद हाथ से आजमाया गया अनुभव।

असली मास्टरस्ट्रोक: कारपेंटर को हीरो बनाना

लेकिन जो कदम इस पूरी कहानी को सबसे अलग बनाता है, वह आया 2002 में। कंपनी ने एक बेहद पते की बात समझी फर्नीचर में कौन सा गोंद इस्तेमाल होगा, यह फैसला असल में ग्राहक नहीं, बल्कि कारपेंटर लेता है। यह इनसाइट इतनी छोटी लगती है, लेकिन इसका असर बहुत बड़ा था। कंपनी ने आम जनता को सीधे टारगेट करने की बजाय अपना पूरा फोकस कारपेंटरों पर केंद्रित कर दिया, और शुरू किया Fevicol चैंपियंस क्लब।

Fevicol Marketing Strategy and Brand Success Story
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आज इस क्लब से भारत के 145 शहरों में 40 हजार से भी ज्यादा कारपेंटर जुड़े हुए हैं। जरा सोचिए कंपनी ने अपने असली इन्फ्लुएंसर उन लोगों को बनाया, जो हर घर में जाकर यह फैसला लेते हैं कि आखिर कौन सा गोंद लगाया जाएगा। यह कोई सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर नहीं था, बल्कि वो कारीगर था जिसकी बात पर ग्राहक बिना सवाल किए भरोसा करता था।

जब विज्ञापन खुद एक कल्चरल आइकॉन बन गया

अब बात करते हैं उन विज्ञापनों की, जिन्होंने Fevicol को सिर्फ एक प्रोडक्ट से निकालकर एक कल्चरल आइकॉन बना दिया। सबसे पहली और सबसे बड़ी बात यह कि Fevicol ने कभी किसी बड़े फिल्मी सितारे का सहारा नहीं लिया। जहां बाकी ब्रांड्स सेलिब्रिटी के पीछे भागते रहे, वहीं Fevicol ने आम आदमी को अपना हीरो बनाया गांव का बैकग्राउंड, रोजमर्रा के किरदार, और ऐसी कहानियां जो हर दर्शक को अपनी सी महसूस होती थीं।

याद कीजिए वह मशहूर ओवरक्राउडेड बस वाला विज्ञापन, जिसमें लोग बस के अंदर ही नहीं, बल्कि बाहर तक चिपके नजर आते हैं। हंसी भी आती है, और साथ ही प्रोडक्ट की ताकत भी बिना एक शब्द कहे समझ आ जाती है। यही Fevicol के विज्ञापनों की असली जान थी  हास्य के जरिए संदेश देना, बिना सीधे-सीधे बेचने की कोशिश किए।

और फिर वह आइकॉनिक टैगलाइन “दम लगा के हईशा”। सिर्फ एक लाइन, लेकिन इतनी मजबूती से लोगों के जेहन में बैठी कि आज भी इसे सुनते ही Fevicol याद आ जाता है। ठीक इसी तरह Fevicol मरीन के लिए कहा गया “पानी में भी नहीं टूटेगा”। छोटा सा वाक्य, लेकिन प्रोडक्ट की सबसे बड़ी खासियत को सीधे दिल में उतार देने वाला।

एक और चीज जो Fevicol की मार्केटिंग को खास बनाती है, वह है इसका इमोशनल कनेक्ट। “शर्मा के दुल्हनिया” जैसे विज्ञापनों ने प्रोडक्ट को सिर्फ उसके काम तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे रिश्तों और भावनाओं से जोड़ दिया। और “गिफ्ट स्टोर” वाले क्रिएटिव कैंपेन ने प्रोडक्ट की मजबूती को इतने मजेदार अंदाज में दिखाया कि दर्शक हंसते भी रहे और साथ-साथ प्रोडक्ट पर उनका भरोसा भी बनता गया। यानी फेविकोल का पूरा फॉर्मूला था भारी-भरकम टेक्निकल बातें नहीं, बल्कि हंसी, इमोशन और रोजमर्रा की जिंदगी की कहानियां। यही वजह है कि आज भी लोग इसके पुराने विज्ञापन यूट्यूब पर ढूंढ-ढूंढकर देखते हैं।

नकल से निपटना और कॉम्पिटिशन को गले लगाना

लेकिन मार्केटिंग सिर्फ विज्ञापनों तक सीमित नहीं रही। जैसे ही Fevicol घर-घर में मशहूर हुआ, नकली प्रोडक्ट्स भी बाजार में उतर आए। लोग सिर्फ डिब्बे का लोगो और डिजाइन देखकर नकली गोंद खरीद लेते थे। पिडीलाइट ने इस समस्या को बेहद गंभीरता से लिया डिब्बों को यूनिक बनाया गया, होलोग्राम और QR कोड जैसी पहचान जोड़ी गई, जागरूकता अभियान चलाए गए, और नकली सामान बेचने वालों पर कानूनी कार्रवाई की गई। इससे एक बड़ी सीख मिलती है किसी ब्रांड को खड़ा करना ही काफी नहीं होता, उसकी पहचान को सुरक्षित रखना भी उतना ही जरूरी होता है।

और जब भी कोई नई कंपनी इस बाजार में कॉम्पिटिशन के तौर पर उतरने की कोशिश करती, पिडीलाइट ने उसे दुश्मन नहीं, बल्कि मौका माना। 2000 में एम-सील और मिस्टर फिक्स-इट को खरीदा गया, 2004 में रॉफ को, और 2010 में वुडलॉक को। यानी कॉम्पिटिशन को खत्म करने का तरीका था उसे अपने ही परिवार में शामिल कर लेना।

Fevicol Marketing Strategy and Brand Success Story
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आखिर में

आज नतीजा सबके सामने है। भारत के एडहेसिव मार्केट में पिडीलाइट की हिस्सेदारी 70% से भी ज्यादा है। और यह सिर्फ प्रोडक्ट की क्वालिटी की वजह से नहीं है बल्कि उस मार्केटिंग सोच की वजह से है, जिसने सेलिब्रिटी की जगह आम आदमी को चुना, महंगे विज्ञापनों की जगह भरोसे को चुना, और हर बदलते दौर में अपने कैंपेन को उतना ही ताजा और रिलेटेबल बनाए रखा।

तो अगली बार जब आप Fevicol का कोई पुराना विज्ञापन देखें और अनायास मुस्कुरा दें, समझ जाइए कि यही वो असली मार्केटिंग है जो सिर्फ प्रोडक्ट नहीं, बल्कि यादें बेचती है।

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