जरा सोचिए, आप अपना नाम Voter List में ढूंढने जाएं और वहां न मिले। यह डर आजकल देश के करोड़ों लोगों की हकीकत बन चुका है। चुनाव आयोग की Special Intensive Revision यानी SIR की तीसरी लहर में अब तक करीब 6 करोड़ से ज्यादा नाम मतदाता सूचियों से हट चुके हैं, और यह सिलसिला अभी थमा नहीं है। यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं है इसके पीछे लाखों-करोड़ों लोगों की चिंता, सवाल और कहीं-कहीं गुस्सा भी छिपा है।
SIR Voter List 2026 में आंकड़े क्या कहते हैं?
चुनाव आयोग ने जिन 16 राज्यों और 3 केंद्र शासित प्रदेशों में इस तीसरे चरण के तहत ड्राफ्ट Voter List जारी की है, वहां पहले कुल 36.08 करोड़ मतदाता दर्ज थे। अब यह संख्या घटकर करीब 29.93 करोड़ रह गई है। यानी 17.04% नाम, कुल मिलाकर 6.15 करोड़ मतदाता, इस छंटाई की जद में आ गए हैं। यह छंटाई मौत, स्थायी रूप से पता बदलने, एक से ज्यादा जगह नाम दर्ज होने और दूसरी वजहों के आधार पर की गई बताई जा रही है।
दिल्ली में तो हालात और भी चौंकाने वाले हैं यहां हर तीसरे में से एक वोटर का नाम सूची से गायब हो गया है, यानी करीब 32.78% या 47.56 लाख नाम हट चुके हैं। संख्या के हिसाब से देखें तो महाराष्ट्र सबसे आगे है, जहां 2.06 करोड़ यानी करीब 21.15% नाम हटाए गए हैं। तेलंगाना (21.69%), कर्नाटक (19.47%) और अरुणाचल प्रदेश (19.09%) जैसे राज्य भी इस सूची में ऊपर आते हैं।
यह सिलसिला कहाँ से शुरू हुआ
अगर आप यह सोच रहे हैं कि यह अचानक शुरू हुई कोई कवायद है, तो ऐसा नहीं है। SIR की शुरुआत पिछले साल जून में बिहार से हुई थी, ठीक विधानसभा चुनावों से पहले। वहां भी Voter List से करीब 65 लाख नाम हटाए गए थे, और उसी वक्त से विपक्ष और कार्यकर्ता यह आरोप लगाते आए हैं कि चुनाव आयोग जरूरी दस्तावेजों की कमी के बहाने आम लोगों का नाम काटकर उन्हें वोट देने के अधिकार से वंचित कर रहा है।
इसके बाद यह प्रक्रिया चरण-दर-चरण देश के बाकी हिस्सों में फैलती गई। पहले और दूसरे चरण में मिलाकर 13 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में यह प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, जिसमें करीब 5.83 करोड़ यानी 10.5% मतदाता सूचियों से हट चुके हैं। अब तीसरा और अंतिम चरण 16 राज्यों और 3 केंद्र शासित प्रदेशों में चल रहा है, जो करीब 36.73 करोड़ मतदाताओं को कवर करता है।
SIR है क्या और यह क्यों हो रहा है
चुनाव आयोग के मुताबिक, SIR संविधान के अनुच्छेद 324 और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 की धारा 21(3) के तहत की जा रही एक बड़े पैमाने की कवायद है, जिसका मकसद Voter List को साफ-सुथरा और सटीक बनाना है। इसके तहत डुप्लीकेट एंट्री, मृत हो चुके मतदाताओं के नाम, और स्थायी रूप से पलायन कर चुके लोगों के नाम हटाए जाते हैं, ताकि सिर्फ योग्य नागरिकों के नाम ही सूची में रहें।
इस काम के लिए बूथ लेवल ऑफिसर यानी BLO घर-घर जाकर वेरिफिकेशन करते हैं। बताया जा रहा है कि यह पिछले दो दशकों से ज्यादा समय में इस पैमाने पर होने वाली पहली राष्ट्रव्यापी संशोधन प्रक्रिया है, जो शहरीकरण और आबादी के भीतर हुए बड़े बदलावों को ध्यान में रखते हुए की जा रही है। सुप्रीम कोर्ट भी इस साल मार्च में इस पूरी प्रक्रिया की संवैधानिक वैधता को एकमत से बरकरार रख चुका है, यानी कानूनी तौर पर इसे चुनौती देने की गुंजाइश फिलहाल सीमित हो गई है।
सवाल आसान नहीं
इतने बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने ने विपक्ष के भीतर गहरी बेचैनी पैदा कर दी है। आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली में हुई भारी छंटाई पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि डेढ़ करोड़ में से 47 लाख वोटरों के नाम गायब हो गए हैं, और भारत सरकार इस तरह देश की आबादी 140 करोड़ से घटाकर 50 करोड़ करने की फिराक में है।

यह सिर्फ दिल्ली तक सीमित नहीं है। कर्नाटक और तेलंगाना के मुख्यमंत्रियों ने भी इन छंटाइयों को “बड़े पैमाने पर हुई और अनुचित” करार देते हुए चुनाव आयोग से claims and objections यानी दावा-आपत्ति की समयसीमा बढ़ाने की मांग की है। पश्चिम बंगाल में तो यह मामला और उलझा हुआ रहा, जहां 27 लाख मतदाताओं की किस्मत का फैसला मतदान से महज दो हफ्ते पहले 19 न्यायिक ट्रिब्यूनल के हवाले छोड़ दिया गया था, और सुप्रीम कोर्ट ने भी उस वक्त कोई अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया था।
रिपोर्ट्स के मुताबिक बंगाल की 294 सीटों में से 150 ऐसी सीटें थीं जहां कुल डिलीशन जीत के मार्जिन से भी ज्यादा थे, और इनमें से भाजपा ने 99 सीटें जीतीं जबकि 2021 में उसने इनमें से सिर्फ 19 सीटें ही जीती थीं। यह आंकड़ा अपने आप में विपक्ष के आरोपों को और धार देता है।
विपक्ष बनाम चुनाव आयोग
यह टकराव कोई नई बात नहीं है। जब से यह प्रक्रिया शुरू हुई है, कांग्रेस लगातार यह सवाल उठाती रही है कि चुनाव आयोग की मंशा और साख दोनों पर भरोसा कमजोर हो रहा है, क्योंकि न तो वोटर संतुष्ट हैं, न ही विपक्षी दल। दूसरी तरफ भाजपा इन आरोपों को खारिज करते हुए विपक्ष पर यह इल्जाम लगाती रही है कि आने वाली हार का ठीकरा वे चुनाव आयोग पर फोड़ना चाहते हैं।
राजस्थान में कांग्रेस नेता सचिन पायलट ने भी इसी तरह की चिंता जताते हुए कहा था कि यह प्रक्रिया बेहद जल्दबाजी में की जा रही है और गरीबों, दलितों, आदिवासियों और कम पढ़े-लिखे तबकों के नाम बड़े पैमाने पर काटे जा रहे हैं। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी इसी मुद्दे पर धरना दिया था, जब पिछली SIR प्रक्रिया के बाद राज्य में करीब 63.66 लाख नाम, यानी वहां के कुल मतदाताओं का करीब 8.3%, सूची से हट गए थे।
आगे क्या होगा
यहां एक जरूरी बात समझनी होगी ड्राफ्ट लिस्ट का मतलब आखिरी फैसला नहीं है। चुनाव आयोग लोगों को दावा और आपत्ति दर्ज कराने के लिए एक निश्चित समयसीमा देता है, जिसके तहत गलती से हटाए गए नाम दोबारा जोड़े जा सकते हैं और नए मतदाता भी रजिस्टर हो सकते हैं। यानी 6 करोड़ का यह आंकड़ा आगे बदल सकता है, घट भी सकता है और कुछ मामलों में और बढ़ भी सकता है, अगर जिन लोगों के नाम अभी लिस्ट में हैं वे जरूरी दस्तावेज जमा नहीं कर पाते।
तीसरे चरण में अभी नगालैंड और त्रिपुरा की ड्राफ्ट लिस्ट आना बाकी है, जो क्रमशः 20 सितंबर और 21 अक्टूबर को जारी होगी। वहीं मिजोरम, सिक्किम और मणिपुर जैसे राज्यों में 6 सितंबर से अंतिम मतदाता सूचियां जारी होना शुरू हो जाएंगी।
असली मुद्दा क्या है
इस पूरी बहस को दो नजरियों से देखा जा सकता है। एक तरफ चुनाव आयोग का तर्क है कि Voter List को साफ करना जरूरी था, क्योंकि दो दशकों में न तो मृत मतदाताओं के नाम हटे थे, न ही पलायन कर चुके लोगों के, और न ही डुप्लीकेट एंट्रीज़ की सफाई हुई थी। इस लिहाज से यह एक जरूरी प्रशासनिक कदम माना जा सकता है।
लेकिन दूसरी तरफ यह चिंता भी उतनी ही वाजिब है कि इतने बड़े पैमाने पर, इतनी तेजी से हो रही छंटाई में गलत तरीके से कई असली और योग्य मतदाताओं के नाम भी कट सकते हैं खासकर उन तबकों के जिनके पास सही दस्तावेज जुटाना आसान नहीं होता, या जो अपनी शिकायत दर्ज कराने के तरीकों से वाकिफ नहीं हैं। लोकतंत्र में वोट देने का अधिकार सबसे बुनियादी अधिकारों में गिना जाता है, और अगर इस अधिकार को छीनने में जरा भी लापरवाही हुई, तो उसका खामियाजा सीधे आम आदमी को भुगतना पड़ेगा।
आम आदमी के लिए इसका मतलब
अगर आप इन 16 राज्यों या 3 केंद्र शासित प्रदेशों में रहते हैं, तो सबसे पहला और जरूरी काम यही है कि आप अपने नजदीकी चुनाव कार्यालय या ऑनलाइन पोर्टल के जरिए यह जरूर जांच लें कि आपका नाम ड्राफ्ट लिस्ट में मौजूद है या नहीं। अगर नाम गायब है, तो घबराने की बजाय तय समयसीमा के भीतर दावा-आपत्ति दर्ज कराना ही सबसे सही रास्ता है। यह प्रक्रिया भले ही राजनीतिक बहस का केंद्र बनी हुई हो, लेकिन आपके वोट देने के अधिकार को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी आखिरकार आपकी सतर्कता पर भी टिकी है।

फिलहाल के लिए यही कहा जा सकता है कि यह कहानी अभी खत्म नहीं हुई है। जैसे-जैसे बाकी राज्यों की सूचियां आएंगी और दावा-आपत्ति की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी, यह आंकड़ा और साफ होता जाएगा। लेकिन तब तक, चुनाव आयोग की मंशा और विपक्ष की आशंकाओं के बीच यह रस्साकशी जारी रहने वाली है।
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