जब पूरा देश सो रहा था, ठीक उस वक्त श्रीहरिकोटा में इसरो के वैज्ञानिक अपनी सबसे बड़ी परीक्षा दे रहे थे। रात 2:55 बजे, जब आसमान अभी भी अंधेरे में डूबा था, GSLV-F17 रॉकेट ने EOS-05 उपग्रह को लेकर उड़ान भरी। और महज 18 मिनट के भीतर इसरो अध्यक्ष डॉ वी नारायणन ने वो ऐलान कर दिया जिसका पूरा देश बेसब्री से इंतजार कर रहा था, मिशन कामयाब रहा, सैटेलाइट बिल्कुल सटीक कक्षा में पहुंच गया।
एक और लॉन्च
अगर आप सोच रहे हैं कि यह इसरो का रोज़मर्रा का काम था, तो जरा ठहरिए। यह लॉन्च इसरो के लिए किसी इम्तिहान से कम नहीं था। पिछले सात महीने से इसरो का कोई भी मिशन उड़ान नहीं भर पाया था। जनवरी में PSLV-C62/EOS-N1 मिशन तीसरे चरण में गड़बड़ी की वजह से नाकाम हो गया था, और उससे पहले भी 2025 में एक और PSLV मिशन असफल रहा था। लगातार दो नाकामियों के बाद इसरो ने अपने रॉकेट प्रोग्राम की गहरी जांच के लिए कुछ समय के लिए लॉन्च रोक दिए थे।
तो जब GSLV-F17 आखिरकार लॉन्च पैड पर पहुंचा, तो इस पर पूरे देश की निगाहें टिकी थीं। यह सिर्फ एक सैटेलाइट भेजने का सवाल नहीं था, बल्कि इसरो के अपने प्रोग्राम पर, अपनी टीम पर, और खुद पर भरोसा दोबारा जमाने का सवाल था।
पांच साल पुराना जख्म
इस मिशन की कहानी को समझने के लिए हमें 2021 में लौटना होगा। अगस्त 2021 में इसरो ने GSLV-F10 रॉकेट से GISAT-1 यानी EOS-03 सैटेलाइट भेजने की कोशिश की थी। रॉकेट ने अच्छी शुरुआत की, पहले और दूसरे चरण में कोई दिक्कत नहीं आई। लेकिन तीसरे चरण में, जहां क्रायोजेनिक इंजन को आग पकड़नी थी, वहां एक वॉल्व से लीकेज हो गई। ईंधन इंजन तक ठीक से नहीं पहुंच पाया, और नतीजा यह हुआ कि सैटेलाइट को सही कक्षा में नहीं पहुंचाया जा सका। पूरा मिशन बीच में ही अटक गया।
उस नाकामी के बाद भारत के पास इस खास कक्षा से लगातार निगरानी करने की क्षमता में एक बड़ा खालीपन आ गया था। बाढ़, चक्रवात, फसलों पर पड़ने वाला तनाव, जंगल की आग, यह सब घंटों में बदल जाते हैं, यह इंतजार नहीं करते। और जो सैटेलाइट किसी एक जगह पर लगातार नजर बनाए रख सके, वही समय रहते अलार्म बजा सकता है। पांच साल तक भारत उस क्षमता के बिना ही काम चलाता रहा। अब EOS-05, जिसे GISAT-1A भी कहा जाता है, उसी खालीपन को भरने आया है।
क्या खास है इस सैटेलाइट में
EOS-05 भारत का पहला ऐसा इमेजिंग सैटेलाइट है जो जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट यानी करीब 36,000 किलोमीटर की ऊंचाई से काम करेगा। यह ऊंचाई खास इसलिए है क्योंकि इस ऑर्बिट में सैटेलाइट पृथ्वी की घूमने की रफ्तार से मेल खाकर चलता है, यानी वह हमेशा एक ही जगह के ऊपर स्थिर सा नजर आता है। ज्यादातर पृथ्वी-निगरानी वाले सैटेलाइट काफी नीचे उड़ते हैं और दिन में कई बार पूरी पृथ्वी का चक्कर लगाते हैं, जिसकी वजह से वे किसी एक इलाके को कुछ ही मिनटों के लिए देख पाते हैं। लेकिन EOS-05 एक बहुत ऊंचे खंभे पर लगे कैमरे की तरह काम करेगा, जो भारत के ऊपर लगभग टिका हुआ रहेगा।

यह सैटेलाइट हर 5 मिनट में किसी चुनी हुई जगह की तस्वीर ले सकता है, और करीब 30 मिनट में पूरे भारतीय भूभाग को कवर कर सकता है। इसमें लगे मल्टीस्पेक्ट्रल और हाइपरस्पेक्ट्रल कैमरे मौसम में आ रहे बदलाव, बादलों की हलचल, चक्रवातों के बनने और उनकी दिशा को पहले से बेहतर तरीके से पकड़ पाएंगे। इसके अलावा यह सैटेलाइट देश की सीमाओं पर भी नजर रखने में मदद करेगा और सुरक्षा एजेंसियों को अहम जानकारी देगा।
लॉन्च की रात क्या हुआ
रॉकेट को शुक्रवार रात करीब 8 बजे सेकंड लॉन्च पैड पर ले जाया गया था, जहां से आखिरी तैयारियां शुरू हुईं। तय समय के मुताबिक रात 2:55 बजे GSLV-F17 ने उड़ान भरी। 51.7 मीटर ऊंचा और 420.5 टन वजनी यह रॉकेट इसरो के सबसे भारी लॉन्च व्हीकल्स में गिना जाता है। इसने EOS-05 को सब-जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट में पहुंचाया, जहां से सैटेलाइट अपने खुद के प्रोपल्शन सिस्टम की मदद से आगे चलकर अपनी अंतिम जियोसिंक्रोनस कक्षा तक पहुंचेगा।
लॉन्च के महज 18 मिनट बाद ही सैटेलाइट अलग हो गया और अपनी तय कक्षा में पहुंच गया। इसरो अध्यक्ष डॉ नारायणन ने पत्रकारों से कहा कि GSLV-F17 वाहन ने बेहद सटीकता के साथ EOS-05 को उसकी जरूरी और तय कक्षा में इंजेक्ट कर दिया है। उन्होंने यह भी बताया कि यह श्रीहरिकोटा से 107वां लॉन्च और GSLV का 19वां मिशन था। और एक दिलचस्प तुलना करते हुए उन्होंने याद दिलाया कि GSLV की पहली उड़ान D1 में सिर्फ 1,536 किलोग्राम का पेलोड ले जाया गया था, जबकि इस बार 2,367 किलोग्राम यानी इस लॉन्च व्हीकल के जरिए भेजा गया अब तक का सबसे भारी सैटेलाइट।
प्रधानमंत्री की प्रतिक्रिया और आगे की राह
लॉन्च की कामयाबी के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इसे भारत के लिए गर्व का पल बताते हुए इसरो और भारतीय उद्योग जगत के बीच बढ़ती साझेदारी की तारीफ की, जो देश के अंतरिक्ष कार्यक्रम को नई ताकत और नया विस्तार दे रही है।
यह लॉन्च इसरो के लिए 2026 की पहली कामयाबी भी है, और यह ऐसे वक्त पर आई है जब PSLV रॉकेट अभी भी अपनी लगातार दो नाकामियों की जांच और वैलिडेशन प्रक्रिया की वजह से जमीन पर खड़ा है। हालांकि GSLV Mk-II, जिसने EOS-05 को लॉन्च किया, PSLV से अलग प्रोपल्शन आर्किटेक्चर पर काम करता है, यानी इन दोनों रॉकेट्स की तकनीकी दिक्कतें आपस में जुड़ी हुई नहीं हैं। इसलिए इस कामयाबी का श्रेय सिर्फ किस्मत को नहीं, बल्कि GSLV की अपनी अलग और भरोसेमंद इंजीनियरिंग को भी जाता है।
इसरो ने आगे का रोडमैप भी साफ कर दिया है। मार्च 2027 तक कुल सात लॉन्च की योजना है, जिसमें गगनयान कार्यक्रम के तहत पहला मानवरहित मिशन G1 भी शामिल है। इसके अलावा इस वित्त वर्ष में 12 सैटेलाइट पूरे करने और आठ लॉन्च व्हीकल मिशन चलाने का लक्ष्य रखा गया है, जो संचार, नेविगेशन, पृथ्वी निगरानी और वैज्ञानिक शोध जैसे कई क्षेत्रों को कवर करेंगे।

आखिर में
पांच साल पहले जो सपना अधूरा रह गया था, वह आज रात पूरा हो गया। EOS-05 अब भारत की आंख बनकर आसमान से देश पर नजर रखेगा। बाढ़, चक्रवात, आग, फसलों की सेहत, और सीमाओं की सुरक्षा, सब कुछ पहले से कहीं तेज रफ्तार से। लेकिन इससे भी बड़ी बात यह है कि इस लॉन्च ने इसरो को वह भरोसा वापस दिलाया है जो पिछले सात महीनों में लगातार दो झटकों की वजह से हिल गया था। अब सबकी नजरें इसरो के अगले कदमों पर टिकी हैं और उम्मीद है कि यह कामयाबी सिर्फ एक शुरुआत है, आने वाले महीनों में और भी बड़े मिशनों की।
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