Beyond Biz

शेयर बाजार में गिरावट: जब अच्छी GDP भी क्रूड ऑयल के आगे बेबस हो गई

यूं तो जब सभी बात भारत की बढ़ती GDP की कर रहे है ठीक उसी बीच एक ऐसी खबर सामने आए जो निवेशकों और बाज़ार दोनों को हिला के रख दे क्योंकि सोचने वाली बात तो है की जहां economy बढ़ती हुई नज़र आ रही है वहीं share market में कमज़ोरी साफ दिखाई दे रहा है। शेयर बाज़ार में भूचाल की स्थिति बनी हुई है। बुधवार की सुबह भारतीय शेयर बाजार के लिए किसी झटके से कम नहीं रही।

एक तरफ देश की GDP ग्रोथ के आंकड़े मजबूत आए हैं, GST कलेक्शन बढ़िया चल रहा है, ऑटोमोबाइल सेल्स और क्रेडिट ग्रोथ भी उत्साहजनक तस्वीर दिखा रहे हैं लेकिन इन सबके बावजूद सेंसेक्स और निफ्टी दोनों करीब एक फीसदी टूट गए। यह वाकई दिलचस्प है कि घरेलू मोर्चे पर सब कुछ ठीक चल रहा हो, फिर भी बाजार लाल निशान में बंद हो, और इसकी वजह भारत के भीतर नहीं बल्कि हजारों किलोमीटर दूर पश्चिम एशिया में छिपी है।

आंकड़ों की बात पहले

BSE सेंसेक्स 713.42 अंक यानी 0.93% गिरकर 76,230.86 पर आ गया। NSE निफ्टी 50 भी 197.80 अंक यानी 0.82% फिसलकर 23,858.00 के स्तर पर पहुंच गया। GIFT निफ्टी भी 122.50 अंक नीचे 23,928.50 पर कारोबार करता दिखा, जो साफ इशारा था कि बाजार कमजोर शुरुआत की तरफ बढ़ रहा है। और हुआ भी वही।

असली वजह क्या है?

इस गिरावट के पीछे की कहानी को समझने के लिए हमें पश्चिम एशिया की तरफ देखना होगा। ईरान से जुड़े तनाव में एक बार फिर तेजी आई है, और इसका सीधा असर क्रूड ऑयल की कीमतों पर पड़ा है। ब्रेंट क्रूड रातोंरात करीब 5% उछलकर 95.33 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया, जबकि WTI क्रूड भी 90.69 डॉलर तक चढ़ गया।

बैंकिंग और मार्केट एक्सपर्ट अजय बग्गा के मुताबिक, मजबूत मैक्रो और GDP आंकड़ों के बावजूद ईरान युद्ध से जुड़ी अनिश्चितता भारतीय बाजारों पर दबाव बना रही है, और फिलहाल वैश्विक कारक घरेलू मजबूती पर हावी हो गए हैं। भारत जैसे देश के लिए, जो अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है, क्रूड की कीमतों में इस तरह की अचानक उछाल हमेशा चिंता की बात होती है। महंगे तेल का मतलब है महंगा आयात बिल, जो आगे चलकर महंगाई और करेंट अकाउंट डेफिसिट, दोनों पर असर डाल सकता है।

दुनिया भर में जोखिम से बचने की होड़

यह सिर्फ भारत की कहानी नहीं है। अमेरिकी बाजारों से लेकर एशियाई बाजारों तक, हर जगह इसी तरह की घबराहट देखी गई। वॉल स्ट्रीट पर नैस्डेक 1.03% गिरकर बंद हुआ, S&P 500 में भी 0.71% की गिरावट आई। इसी कमजोरी का असर एशिया पर भी दिखा जहां जापान का निक्केई 225 करीब 2.81% टूटा, दक्षिण कोरिया का कोस्पी 3.44% गिरा, और हॉन्ग कॉन्ग का हैंग सेंग 1.17% नीचे आया।

शेयर बाजार में गिरावट और क्रूड ऑयल का असर
Image Source: Google

बग्गा ने यह भी बताया कि न्यूजीलैंड भी अब उन केंद्रीय बैंकों की सूची में शामिल हो गया है जिन्होंने बढ़ती महंगाई पर लगाम कसने के लिए ब्याज दरें बढ़ाई हैं। यूरोपीय सेंट्रल बैंक और बैंक ऑफ जापान भी इसी महीने दरें बढ़ाने की तैयारी में हैं। जब दुनिया भर में महंगाई सेंट्रल बैंकों के टारगेट से ऊपर चल रही हो, तो आगे भी ब्याज दरों में बढ़ोतरी की आशंका बनी रहती है और यह किसी भी शेयर बाजार के लिए अच्छी खबर नहीं होती।

घरेलू मजबूती बनाम वैश्विक दबाव

जियोजित इन्वेस्टमेंट्स के चीफ इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजिस्ट वी के विजयकुमार ने इस पूरी स्थिति को बहुत सटीक ढंग से बयां किया। उनके मुताबिक बाजार इस वक्त घरेलू मजबूती और बाहरी दबाव के बीच फंसा हुआ है। पहली तिमाही के शानदार GDP आंकड़े, GST कलेक्शन का हाई-फ्रीक्वेंसी डेटा, क्रेडिट ग्रोथ, ऑटोमोबाइल सेल्स और कमाई बढ़ने की उम्मीदें यह सब बाजार के लिए बड़े सकारात्मक संकेत हैं।

लेकिन दूसरी तरफ अमेरिका-ईरान तनाव बढ़ने और उसके नतीजे में ब्रेंट क्रूड में आई तेज उछाल ने सेंटिमेंट को नकारात्मक बना दिया है। हालांकि विजयकुमार ने एक जरूरी बात भी जोड़ी की यह खतरा उतना बड़ा नहीं है जितना लग रहा है, क्योंकि भारत का करेंट अकाउंट डेफिसिट फिलहाल सिर्फ 0.5% पर है और विदेशी मुद्रा भंडार भी करीब 730 अरब डॉलर के साथ काफी मजबूत स्थिति में है। यानी भारत के पास इस झटके को झेलने की गुंजाइश मौजूद है, भले ही अभी बाजार का मूड खराब क्यों न हो।

सोना क्यों फिसला?

आमतौर पर जब बाजार में जोखिम से बचने की होड़ मचती है, तो निवेशक सोने की तरफ भागते हैं। लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ। सोना 0.86% गिरकर 4,291.35 डॉलर पर आ गया। यह थोड़ा असामान्य लग सकता है, लेकिन इसकी वजह शायद यह है कि निवेशकों का ध्यान इस वक्त बॉन्ड यील्ड और ब्याज दरों की दिशा पर ज्यादा केंद्रित है, ना कि पारंपरिक सेफ-हेवन एसेट्स पर।

आगे नजर किस पर रखनी होगी

विजयकुमार ने जिस चीज को सबसे बड़ा खतरा बताया, वह है अमेरिका में बढ़ती बॉन्ड यील्ड। उनके मुताबिक अगर अमेरिका की 10-साल की बॉन्ड यील्ड 5% के स्तर को छूती है, तो इससे दुनिया भर के शेयर बाजारों में बड़ी करेक्शन आने की आशंका बन सकती है। यही वह मैक्रो इंडिकेटर है जिस पर बाजार की नजरें आने वाले दिनों में टिकी रहेंगी।

असल में यह पूरी स्थिति एक रस्साकशी जैसी है एक तरफ घरेलू अर्थव्यवस्था की मजबूती बाजार को ऊपर खींचने की कोशिश कर रही है, तो दूसरी तरफ ग्लोबल जियोपॉलिटिक्स और महंगे क्रूड का दबाव उसे नीचे धकेल रहा है। निकट भविष्य में बाजार किस दिशा में जाएगा, यह इसी बात पर निर्भर करेगा कि इन दोनों ताकतों में से कौन सी ज्यादा भारी पड़ती है।

निवेशकों के लिए इसका क्या मतलब है

अगर आप शेयर बाजार में पैसा लगाए बैठे हैं, तो इस गिरावट को घबराहट में लिया गया फैसला बनाने की जरूरत नहीं है। भारत की बुनियादी अर्थव्यवस्था है GDP ग्रोथ, टैक्स कलेक्शन, क्रेडिट ग्रोथ अब भी मजबूत नजर आ रही है, और यह किसी एक दिन की गिरावट से खत्म नहीं हो जाती। लेकिन साथ ही, पश्चिम एशिया में जारी तनाव और उससे जुड़ी क्रूड ऑयल की अनिश्चितता को हल्के में लेना भी सही नहीं होगा। जब तक वहां हालात साफ नहीं होते, बाजार में उतार-चढ़ाव बना रह सकता है।

शेयर बाजार में गिरावट और क्रूड ऑयल का असर
Image Source: Google

इस पूरी घटना से एक सबक जरूर मिलता है की बाजार सिर्फ किसी देश के अपने आंकड़ों पर नहीं चलता। दुनिया कितनी आपस में जुड़ी हुई है, यह तब सबसे ज्यादा साफ दिखता है जब हजारों किलोमीटर दूर किसी क्षेत्र में तनाव बढ़ने से मुंबई के दलाल स्ट्रीट पर हलचल मच जाती है। फिलहाल के लिए सबसे समझदारी भरा रुख यही है कि घरेलू मजबूती पर भरोसा बनाए रखें, लेकिन वैश्विक घटनाक्रम पर भी लगातार नजर रखें खासकर क्रूड ऑयल की कीमतें और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड, जो आने वाले दिनों की दिशा तय करने वाले सबसे अहम संकेतक साबित हो सकते हैं।

Leave a Comment