Project Petal: समुद्र की तलहटी में बिछ रहा है इंटरनेट का अगला दौर
Project Petal: रात के खाने के बाद आप बिस्तर पर लेटे हैं और फोन पर Instagram Reel स्क्रॉल कर रहे हैं। बीच में ChatGPT से कोई सवाल पूछ लिया, फिर एक भारी फाइल डाउनलोड पर लगा दी। सब कुछ कुछ ही सेकंड में हो गया। पर कभी रुककर सोचा है कि हज़ारों किलोमीटर दूर बैठे सर्वर से ये सारा डेटा आपके फोन तक पहुंचा कैसे? ज़्यादातर लोग मान लेते हैं कि इसमें सैटेलाइट का हाथ होगा। हक़ीक़त थोड़ी अलग है। अलग-अलग देशों के बीच इंटरनेट का बहुत बड़ा हिस्सा समुद्र के नीचे बिछी केबलों से होकर गुज़रता है।
आसमान में नहीं, पानी की गहराई में। और अब Facebook और Instagram की पैरेंट कंपनी Meta इसी रास्ते को और चौड़ा करने में जुटी है। प्रोजेक्ट का नाम है Project Petal। दावा है कि अमेरिका और फ्रांस के बीच प्रति सेकंड 1 पेटाबिट तक डेटा भेजने की क्षमता हासिल की जा सकती है।
आखिर ये प्रोजेक्ट है
क्या आज इंटरनेट का मतलब सिर्फ़ वीडियो देखना या मैसेज भेजना नहीं रह गया। AI चैटबॉट, विशाल डेटा सेंटर, क्लाउड कंप्यूटिंग और सोशल मीडिया का बढ़ता ट्रैफिक, सबको ऐसा नेटवर्क चाहिए जो पहले से कहीं ज़्यादा डेटा संभाल सके। इसी दौड़ में Meta अपने समुद्री नेटवर्क की क्षमता बढ़ा रही है। रिपोर्ट के मुताबिक Project Petal में अमेरिका से फ्रांस तक करीब 7,000 किलोमीटर लंबी समुद्री केबल बिछाने की योजना है, और इसे 2029 में चालू करने का लक्ष्य बताया गया है। यानी इंटरनेट की अगली बड़ी छलांग शायद आसमान में नहीं, समुद्र की तलहटी में लग रही है।
1 पेटाबिट का मतलब क्या हुआ
1 पेटाबिट प्रति सेकंड यानी लगभग 10 लाख गीगाबिट प्रति सेकंड। इतना बड़ा आंकड़ा कि दिमाग ठीक से पकड़ ही नहीं पाता। पर यहां एक बात साफ़ रहनी चाहिए। ये केबल की बताई गई संभावित कुल क्षमता है, किसी एक यूज़र की स्पीड नहीं। ऐसा नहीं कि कल से आपकी हर फाइल इसी रफ़्तार से उतरेगी। इतनी क्षमता का असल मकसद भविष्य की तैयारी है, जब AI मॉडल और डेटा सेंटर आपस में भारी मात्रा में जानकारी का लेन-देन करेंगे। आज इंटरनेट पर सिर्फ़ इंसान नहीं, मशीनें भी एक-दूसरे से लगातार बात कर रही हैं, और उनकी बातचीत का वज़न बढ़ता जा रहा है।
केबल के अंदर की तकनीक
अब सबसे दिलचस्प हिस्सा। समुद्री केबल के भीतर ऑप्टिकल फाइबर होते हैं, यानी बाल से भी पतले कांच के रेशे। इनमें डेटा बिजली से नहीं, रोशनी के संकेतों की शक्ल में दौड़ता है। रिपोर्ट के मुताबिक Project Petal में एक ही फाइबर के अंदर रोशनी को राह दिखाने वाले 2 अलग-अलग कोर इस्तेमाल किए जाते हैं। इसे यूं समझिए। आपके सामने एक सड़क है जहां ट्रैफिक बढ़ता जा रहा है।
एक तरीका है सड़क को चौड़ा करना, जिसमें ज़मीन और खर्च दोनों लगते हैं। दूसरा तरीका है उसी सड़क पर इस तरह लेन बनाना कि ज़्यादा गाड़ियां निकल सकें। Meta की तकनीक दूसरे तरीके जैसी है। केबल का आकार बढ़ाए बिना, एक फाइबर में 2 कोर लगाकर ज़्यादा डेटा ढोना।
रिपोर्ट कहती है कि इस डिज़ाइन में 24 फाइबर पेयर इस्तेमाल करके क्षमता के हिसाब से 48 फाइबर पेयर जितना काम लेने का लक्ष्य है। इस काम में Meta ने जापान की Sumitomo Electric और NEC जैसी कंपनियों के साथ मिलकर काम किया है। कम जगह, ज़्यादा डेटा। यही इस तकनीक की सबसे बड़ी खूबी है।
आम आदमी को इससे क्या मिलेगा
Project Petal: पहली बात, ज़्यादा क्षमता वाला नेटवर्क आने वाले वक्त में AI और क्लाउड सेवाओं की बढ़ती ज़रूरतों को संभालने में मदद कर सकता है। दूसरी, बड़े डेटा सेंटरों के बीच भारी जानकारी का आना-जाना आसान हो सकता है। तीसरी, अगर ये तकनीक बड़े पैमाने पर कामयाब रही, तो आगे की समुद्री केबलें भी ज़्यादा क्षमता के साथ बनाई जा सकेंगी। पर यहां एक बात ज़रूर ध्यान में रखिए। सिर्फ़ समुद्री केबल की क्षमता बढ़ने से आपके मोबाइल का इंटरनेट अपने आप तेज़ नहीं हो जाएगा।

उसके लिए आपके देश का नेटवर्क, आपका इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर और बाकी ढांचा भी उतना ही मायने रखता है। ये बदलाव इंटरनेट की नींव मज़बूत करने की दिशा में है, आपके फोन की स्पीड लाखों गुना बढ़ाने वाली कोई जादू की छड़ी नहीं।
आखिर में
Project Petal समुद्र के नीचे सिर्फ़ तार बिछाने की कहानी नहीं है। ये उस दुनिया की तैयारी है जहां AI, डेटा सेंटर और डिजिटल सेवाओं को आज के मुकाबले कई गुना ज़्यादा डेटा चाहिए होगा। एक कहावत है, “दिखता है कम, लेकिन काम करता है ज़्यादा।” समुद्र की गहराई में पड़े ये कांच के रेशे ठीक ऐसे ही हैं। नज़र नहीं आते, पर पूरी दुनिया को आपस में जोड़े रखने का भारी काम चुपचाप यही करते हैं।
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