सोचिए, एक आदमी पहले RBI का पहला भारतीय Governor बने, फिर देश का Finance Minister बनकर सात बार Budget पेश करे, Bretton Woods में भारत की आर्थिक आवाज़ बने, और आज़ाद भारत की शुरुआती बैंकिंग व फाइनेंशियल संस्थाओं की नींव रखने में भूमिका निभाए। सुनने में यह किसी एक व्यक्ति की नहीं, कई लोगों की कहानी लगती है। लेकिन यह सब एक ही शख्स ने किया था, C.D. Deshmukh ने।
1943 में जब उन्होंने RBI संभाला, भारत तब तक आज़ाद भी नहीं हुआ था। फिर Partition से लेकर आज़ाद भारत के शुरुआती आर्थिक फैसलों तक, वे हर बड़े मोड़ पर मौजूद रहे। सवाल यह है कि इतना सब करने के बावजूद आज उनका नाम हमारी economic history के सबसे चर्चित चेहरों में क्यों नहीं है।
शुरुआत, British system के भीतर से
C.D. Deshmukh का जन्म 14 जनवरी 1896 को बॉम्बे प्रेसीडेंसी के एक छोटे से गांव नाटे में हुआ था। पढ़ाई में इतने तेज़ थे कि 1912 में University of Bombay की matriculation परीक्षा में प्रथम आए, फिर Cambridge गए, वहां Natural Sciences पढ़ी, और 1918 में लंदन में हुई Indian Civil Service की परीक्षा में पहला स्थान हासिल किया। यानी उनकी शुरुआत किसी राजनीतिक आंदोलन से नहीं, उस British administrative system से हुई थी, जिसके खिलाफ कुछ ही दशकों बाद भारत अपनी आज़ादी की लड़ाई लड़ रहा था। इतिहास की दिलचस्प बात यही है कि कभी-कभी उसी व्यवस्था का हिस्सा बना कोई व्यक्ति आगे चलकर स्वतंत्र भारत की संस्थाएं खड़ी करने में सबसे अहम भूमिका निभाता है।
1939 में C.D. Deshmukh का जुड़ाव Reserve Bank of India से शुरू हुआ, पहले लायज़न ऑफिसर(Liaison Officer) के तौर पर, फिर बैंक सेक्रेटरी(Bank Secretary), फिर 1941 में Deputy Governor। और 1943 में, जब World War II अपने चरम पर था, उन्हें RBI का Governor बनाया गया। यह ज़रूर साफ कर देना चाहिए, वे RBI के पहले Governor नहीं थे, यह पद पहले Sir Osborne Smith और उसके बाद Sir James Braid Taylor के पास रहा।
C.D Deshmukh RBI के तीसरे Governor थे, लेकिन पहले भारतीय Governor। 1943 से 1949 तक उन्होंने RBI को ऐसे दौर में संभाला जब दुनिया युद्ध में थी, भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था, महंगाई और करेंसी मैनेजमेंट की बड़ी चुनौतियां थीं, और कुछ ही साल बाद देश को Partition और Independence की आर्थिक उथल-पुथल से गुज़रना था।
लेकिन Deshmukh सिर्फ Governor की कुर्सी पर बैठे रहने वाले अफसर नहीं थे। उन्होंने RBI की economic research और statistics वाली संस्थागत मशीनरी को मज़बूत किया। rural credit पर ज़ोर दिया, ताकि भारतीय कृषि सिर्फ साहूकारों के भरोसे न रहे। industrial finance की ज़रूरत समझते हुए वह ढांचा आगे बढ़ाया जिससे बाद में IFCI जैसी development-finance संस्थाएं वजूद में आईं। जिस आर्थिक ढांचे को आज हम बहुत सामान्य मानते हैं, रिसर्च-आधारित सेंट्रल बैंकिंग, एग्रीकल्चरल क्रेडिट, डेवलपमेंट फाइनेंस, उसकी शुरुआती नींव रखने वालों में Deshmukh का नाम था।

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Bretton Woods और Partition के बीच
उनकी कहानी सिर्फ भारत तक सीमित नहीं थी। 1944 में दुनिया के कुछ सबसे बड़े अर्थशास्त्री और नीति-निर्माता अमेरिका के Bretton Woods में इकट्ठा हुए, वहीं से आगे चलकर IMF और World Bank जैसी संस्थाओं की नींव पड़ी। उस कॉन्फ्रेंस में भारत की तरफ से एक अहम आवाज़ थी, C.D. Deshmukh की। याद रखने वाली बात यह है कि तब भारत आज़ाद देश नहीं था, फिर भी C.D. Deshmukh ने उस इंटरनेशनल फाइनेंशियल आर्किटेक्चर में भारत के आर्थिक हितों को सामने रखा। उनकी अंतरराष्ट्रीय साख का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि वे आगे चलकर दस साल तक IMF और IBRD के Board of Governors में भारत का प्रतिनिधित्व करते रहे।
फिर आया 1947। भारत आज़ाद हुआ, लेकिन साथ में Partition भी हुआ। और Partition सिर्फ ज़मीन का बंटवारा नहीं था, करेंसी, बैंकिंग, रिज़र्व और फाइनेंशियल एसेट्स, सबके बंटवारे का सवाल था। एक ऐसी स्थिति में RBI को संभालना, जिसमें एक पुरानी मॉनेटरी सिस्टम दो नए देशों में बंट रही थी, किसी सामान्य सेंट्रल बैंकर के लिए आसान चुनौती नहीं थी, और C.D. Deshmukh उस दौर के केंद्र में थे।
1 जनवरी 1949 को RBI का नेशनलाइज़ेशन हुआ, और यहां कहानी थोड़ी और दिलचस्प हो जाती है। जिस RBI को मज़बूत करने में उनकी भूमिका रही, उसके नेशनलाइज़ेशन को लेकर कुछ जानकारों के मुताबिक Deshmukh खुद पूरी तरह उत्साहित नहीं थे। यानी उन्हें सिर्फ “नेशनलाइज़ेशन के समर्थक” या “विरोधी” के किसी आसान खांचे में रखना मुश्किल है, उनके लिए institution और policy, ideology से कहीं ज़्यादा मायने रखती थी।
Finance Minister बनना, और सात Budget
1949 के बाद उनकी भूमिका और बड़ी होने वाली थी। जब भारत अपनी पहली Five-Year Plan इकॉनमी की तरफ बढ़ रहा था, Deshmukh Planning Commission के शुरुआती काम से जुड़े। फिर आया वह पद जिसने उन्हें RBI Governor से सीधे देश की पूरी आर्थिक नीति के केंद्र में ला खड़ा किया, C.D. Deshmukh बने भारत के Finance Minister, 1950 से 1956 तक।
आज जब हम Budget को सिर्फ एक सालाना राजनीतिक इवेंट की तरह देखते हैं, तब याद रखना चाहिए कि उस दौर में Budget का मतलब था एक बिल्कुल नए देश की आर्थिक प्राथमिकताएं तय करना। सरकार के पास कितना पैसा है, कितना टैक्स लगे, डेवलपमेंट पर कितना खर्च हो, इंफ्रास्ट्रक्चर और इंडस्ट्री के लिए संसाधन कहां से आएं, गरीबी से लड़ने और ग्रोथ बढ़ाने के बीच बैलेंस कैसे बने, इन्हीं सवालों के बीच Deshmukh खड़े थे। उन्होंने अपने कार्यकाल में कुल सात Union Budget पेश किए, यह रिकॉर्ड बाद में सिर्फ यशवंतराव चव्हाण और यशवंत सिन्हा जैसे कुछ गिने-चुने Finance Ministers ही छू पाए।
उनके कार्यकाल में कुछ ऐसे फैसले हुए जिनका असर दशकों तक भारतीय economy पर रहा। 1955 में Imperial Bank का नेशनलाइज़ेशन हुआ और State Bank of India वजूद में आया। 1956 में लाइफ इंश्योरेंस बिज़नेस का नेशनलाइज़ेशन हुआ और LIC बनी। जिस आदमी को आज हम शायद सिर्फ “RBI का पहला भारतीय Governor” समझते हैं, वह असल में उस पूरे आर्थिक ढांचे को बनाने में शामिल था जिसे आज़ाद भारत ने अपने शुरुआती दशकों में अपनाया।
Bombay वाला मोड़
फिर कहानी में एक बड़ा twist आता है। जनवरी 1956 में नेहरू ने एकतरफा ऐलान किया कि Bombay को States Reorganisation के दौरान केंद्र-शासित इलाका बनाया जाएगा, Maharashtra से अलग रखकर। Deshmukh इस फैसले से असहमत थे, 22 जनवरी 1956 को उन्होंने इस्तीफे का ऐलान कर दिया। लेकिन यह कोई एक दिन की घटना नहीं थी, अगले कई महीने इस्तीफे की औपचारिक प्रक्रिया में लगे, और आखिरकार 25 जुलाई 1956 को उन्होंने Lok Sabha में इसकी विस्तृत वजह बताई। उन्होंने कहा कि वे इस फैसले की ज़िम्मेदारी साझा नहीं कर सकते, और नेहरू के तरीके को “मनमाना और असंवैधानिक” तक बताया।
Deshmukh ने यह भी आरोप लगाया कि अहम फैसलों में Cabinet को बायपास किया गया। नेहरू ने इन आरोपों को स्वीकार नहीं किया, बाद में उन्होंने लिखा कि उन्होंने यह मामला Cabinet colleagues के सामने रखा और सदस्यों ने Deshmukh के आरोपों को सही नहीं माना। तो यह कहना सही नहीं होगा कि नेहरू ने Deshmukh को हटाया, असल में इस्तीफा खुद Deshmukh ने दिया था। कुछ आर्थिक इतिहासकार, जैसे Milton Friedman और I.G. Patel, यह भी मानते हैं कि इस्तीफे की एक और वजह देश की उभरती सोशलिस्ट आर्थिक नीतियों से बढ़ती असहमति भी रही होगी, हालांकि खुद Deshmukh ने सार्वजनिक तौर पर Bombay के मुद्दे को ही मुख्य वजह बताया।
राजनीति के बाद भी संस्थाएं बनाते रहे
इस्तीफे के बाद भी Deshmukh का काम रुका नहीं। वे University Grants Commission के पहले Chairman बने और 1961 तक इस पद पर रहे, 1959 में India International Centre की स्थापना में भूमिका निभाई, फिर 1962 से 1967 तक University of Delhi के Vice Chancellor रहे। 1975 में उन्हें Padma Vibhushan मिला, इससे पहले 1959 में Ramon Magsaysay Award भी मिल चुका था। यानी राजनीति से बाहर निकलने के बाद भी वे उसी काम में जुटे रहे जिसमें उनकी असली पहचान थी, संस्थाएं खड़ी करना।

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इतने underrated क्यों हैं
इतना सब करने के बाद भी C.D. Deshmukh इतने underrated क्यों हैं? शायद इसलिए क्योंकि उन्होंने इतिहास में अपनी तस्वीर नहीं बनाई, उन्होंने institutions बनाए। Nehru के पास एक vision था, Mahalanobis के पास उस vision का statistical model था, लेकिन उस vision को finance करने के लिए जिस financial machinery की ज़रूरत थी, उसमें Deshmukh जैसे लोगों की भूमिका थी।
उन्होंने RBI को उस दौर में संभाला जब भारत sovereign monetary system की तरफ बढ़ रहा था, इंटरनेशनल फाइनेंशियल निगोशिएशन में भारत की आवाज़ रखी, Planning Commission के शुरुआती दौर में काम किया, Finance Minister बनकर सात Budget पेश किए, बैंकिंग और इंश्योरेंस के बड़े स्ट्रक्चरल रिफॉर्म्स के दौर में फैसले लिए, और आखिर में जब लगा कि सरकार का फैसला उनके conscience के खिलाफ है, तो सत्ता की कुर्सी छोड़ दी।
शायद इसीलिए C.D. Deshmukh की कहानी हमें एक अलग तरह का लीडर दिखाती है। वह नेता नहीं, जो सबसे ज़्यादा दिखाई देता है, बल्कि वह व्यक्ति, जो सबसे ज़रूरी institutions के पीछे खड़ा दिखाई देता है। आज अगर हम भारत की economic history की तस्वीर बनाएं और उसमें सिर्फ नेहरू, महालनोबिस या बाद के दौर के बड़े चेहरों को रखें, तो तस्वीर अधूरी रहेगी। क्योंकि उस तस्वीर के पीछे एक आदमी और खड़ा है, C.D. Deshmukh, RBI का पहला भारतीय Governor, भारत का Finance Minister, सात Budget पेश करने वाला शुरुआती economic architect, और शायद भारत की economic story का वह किरदार जो इतिहास की किताबों में मौजूद तो है, लेकिन हमारी collective memory में कहीं पीछे छूट गया।
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