एक किसान हर साल थोड़ी ज्यादा खाद डालता है। उम्मीद यही रहती है कि इस बार फसल पिछले साल से बेहतर होगी। कुछ सालों तक ये तरीका काम भी करता है। फिर एक दिन अचानक पैदावार गिरने लगती है, और किसान को समझ नहीं आता कि गलती कहां हुई। यही कहानी लाखों खेतों में दोहराई जा रही है, और सरकार ने अब इसी को रोकने के लिए एक अभियान शुरू किया है, नाम रखा है Khet Bachao Abhiyan।
दिलचस्प बात ये कि इस बार दुश्मन बाढ़ नहीं है, सूखा नहीं है, कोई कीट या महामारी भी नहीं। दुश्मन है खुद किसानों की वो आदत जो उन्हें ही धीरे-धीरे नुकसान पहुंचा रही है। ये आदत किसी की गलती से नहीं बनी, बल्कि दशकों से चली आ रही सोच का नतीजा है, जिसमें ज्यादा इनपुट को हमेशा ज्यादा आउटपुट का ज़रिया मान लिया गया। खाद की दुकान पर भी अक्सर यही सलाह मिलती है, थोड़ी और डाल लो, नुकसान क्या है। नुकसान दिखता नहीं, इसलिए महसूस भी देर से होता है।
National Agriculture Conference Rabi Campaign 2026 के दूसरे दिन, केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने एक साथ कई ऐलान किए। पहला ऐलान पैसे का था, दूसरा मिट्टी बचाने की मुहिम का, और तीसरा तालमेल बेहतर करने का। तीनों आपस में जुड़े हुए हैं, और तीनों को एक साथ समझना ज़रूरी है।
पहले पैसे की बात
PM-RKVY यानी Pradhan Mantri Rashtriya Krishi Vikas Yojana के तहत दस राज्यों को कुल 1,281 करोड़ रुपये मंज़ूर हुए, sanction letters सीधे राज्यों के कृषि मंत्रियों को सौंपे गए। West Bengal को सबसे ज्यादा मिला, 290 करोड़। उसके बाद Haryana (198 करोड़), Chhattisgarh (181 करोड़), Arunachal Pradesh (154 करोड़), Bihar (114 करोड़), Karnataka (104 करोड़), Mizoram (75 करोड़), Himachal Pradesh (64 करोड़), Jharkhand (58 करोड़), और सबसे कम Punjab को, 43 करोड़। रकम बांटने का तरीका बराबर वाला नहीं रहा, हर राज्य की अपनी तैयारी और ज़रूरत के हिसाब से फैसला हुआ दिखता है।
PM-RKVY है क्या चीज़
PM-RKVY कोई नई योजना नहीं, 2007-08 की पुरानी Rashtriya Krishi Vikas Yojana का ही नया रूप है, जिसे अक्टूबर 2024 में फिर से डिज़ाइन किया गया। इसकी खासियत यही है कि राज्यों को तय नहीं किया जाता कि पैसा कहां लगाना है, बल्कि Soil Health Management से लेकर सिंचाई, मशीनीकरण, फसल विविधता और यहां तक कि Agri Startups तक, नौ अलग-अलग दरवाज़े खुले रहते हैं, राज्य अपनी ज़रूरत के हिसाब से चुन सकते हैं।

मान लीजिए किसी पहाड़ी राज्य में पानी की सबसे बड़ी समस्या है, तो वो Per Drop More Crop जैसे हिस्से पर ज्यादा ध्यान दे सकता है। किसी और राज्य में युवाओं में कृषि स्टार्टअप का रुझान बढ़ रहा हो, तो वो Accelerator Fund पर ज़ोर दे सकता है। एक ही केंद्रीय स्कीम, पर दस राज्यों में दस अलग-अलग प्राथमिकताएं, यही इसकी असली ताकत है।
अब असली मुद्दे पर, Khet Bachao Abhiyan
ये अभियान 22 अक्टूबर से 30 नवंबर 2026 तक चलेगा। मकसद साफ है, मिट्टी की सेहत सुधारना, खाद का इस्तेमाल संतुलित करना, और Soil Health Card के ज़रिए किसानों को सही मात्रा बताना। जो मिट्टी सालों से ज़्यादा खाद झेलती आई है, उसे अब एक तरह से सांस लेने का मौका देने की कोशिश है ये।
तालमेल बिठाने की एक अलग कोशिश
इसके साथ एक दूसरा काम भी शुरू हुआ है, जो उतना चमकदार नहीं लगता पर उतना ही ज़रूरी है। हर महीने राज्यों के साथ virtual reviews होंगी। हर राज्य में एक State Agriculture Team बनेगी, जिसमें मंत्री से लेकर सचिव, कृषि विश्वविद्यालय, ICAR, Krishi Vigyan Kendra, किसान संगठन, और यहां तक कि exporters तक शामिल रहेंगे। वजह सीधी है, नीति दिल्ली में बनती है, पर असर खेत में दिखना चाहिए, और अब तक दोनों के बीच का फासला अक्सर बड़ा रहा है।
ऐसी बैठकों की ज़रूरत इसलिए भी समझ आती है क्योंकि अक्सर योजनाएं बनती हैं, फंड जारी होता है, पर महीनों बाद पता चलता है कि कहीं पैसा खर्च ही नहीं हुआ, या जिस मकसद के लिए भेजा गया था उससे अलग काम में लग गया। हर महीने की समीक्षा से कम से कम इतना तो तय होगा कि कोई गड़बड़ी छह महीने बाद नहीं, एक महीने में ही पकड़ में आ जाए।
रबी सीज़न के लिए साफ हिदायतें
रबी सीज़न के लिए भी कुछ साफ निर्देश दिए गए हैं। बीज और फसल चुनते वक्त राज्य मिट्टी की नमी और पानी की उपलब्धता देखें, मनमाने ढंग से फैसला न लें। नकली खाद और मिलावटी बीज पर सख्ती की बात भी दोहराई गई, क्योंकि इसका सीधा नुकसान किसान की जेब पर पड़ता है। और एक खास फोकस भी है, Jharkhand, Bihar, Odisha और West Bengal जैसे धान वाले राज्यों की खाली पड़ी ज़मीन पर दलहन उगाने को बढ़ावा देना, क्योंकि भारत अब भी काफी दाल बाहर से मंगाता है।
कुल मिलाकर
इन सारी बातों को एक साथ रखकर देखें तो पैटर्न साफ दिखता है। पैसा बांटा जा रहा है, मिट्टी बचाने की मुहिम चल रही है, और नीति बनाने वालों को खेत के करीब लाने की कोशिश हो रही है। तीनों अलग-अलग दिखते हैं, पर असल में एक ही सवाल का जवाब ढूंढ रहे हैं, खेती सिर्फ इस साल की फसल तक सीमित न रहे, अगले बीस साल भी उतनी ही उपजाऊ ज़मीन बची रहे।

पैसा मंज़ूर होना सबसे आसान हिस्सा है। असली काम तो अब शुरू होगा, जब ये नीतियां कागज़ से निकलकर किसी किसान के खेत तक पहुंचेंगी। और वहां तक पहुंचते-पहुंचते अक्सर रास्ता लंबा और उबड़-खाबड़ निकलता है, कभी बीच में कोई स्थानीय अधिकारी देर कर देता है, कभी जानकारी किसान तक पहुंच ही नहीं पाती। अगली बार जब फसल कटने का मौसम आए, तभी पता चलेगा कि इस बार मिट्टी को सच में वो राहत मिली या नहीं जिसकी बात आज की गई है।
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