Beyond Biz

बिहार(Bihar) में सड़कों पर ढाई लाख करोड़ का दांव, पैसा आएगा कहां से यही सबसे दिलचस्प हिस्सा है

Bihar Road Projects: जिस सफर में अभी पूरा दिन निकल जाता है, वही सफर आने वाले वक्त में सिर्फ कुछ घंटों में सिमट सकता है। सुनने में बड़ा दावा लगता है, पर ये कोई हवाई वादा नहीं। बिहार Investor Meet में केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने राज्य की सड़कों को लेकर जो तस्वीर रखी, उसके पीछे पैसा, ज़मीन और एक पूरी योजना है।

सबसे पहले तीन आंकड़े समझिए। बिहार(Bihar) में करीब 68,000 करोड़ रुपये के सड़क प्रोजेक्ट पहले ही पूरे हो चुके हैं। 65,100 करोड़ रुपये का काम अभी चल रहा है। और आगे सवा लाख करोड़ रुपये के प्रोजेक्ट प्रस्तावित हैं। तीनों को जोड़ दीजिए, आंकड़ा पहुंचता है करीब ढाई लाख करोड़ रुपये तक।

किसी एक राज्य के लिए ये कोई छोटी रकम नहीं है। ये वाकई एक ऐसा आंकड़ा है जो बताता है कि बिहार की सड़कों को लेकर सोच अब सिर्फ मरम्मत या चौड़ीकरण तक सीमित नहीं रही, बल्कि राज्य को पूरे देश के बड़े हाईवे नेटवर्क से जोड़ने की दिशा में एक लंबी योजना बन चुकी है।

Bihar Road Projects: 2014 से अब तक का फर्क

Bihar Road Projects: पीछे मुड़कर देखें तो 2014 में बिहार में नेशनल हाईवे की कुल लंबाई थी करीब 4,615 किलोमीटर। अब ये बढ़कर करीब 6,500 किलोमीटर हो चुकी है। इसी बीच 2,910 किलोमीटर सड़क, करीब 31 हज़ार करोड़ की लागत से, बनकर तैयार हो चुकी है।

अब इन आंकड़ों के पीछे जो असली प्रोजेक्ट हैं, वो देखना ज्यादा दिलचस्प है। Ram-Janaki Marg, 440 किलोमीटर, 5,044 करोड़ की लागत, 87 प्रतिशत काम पूरा। Buddhist Circuit Marg, 1,600 किलोमीटर, करीब 22 हज़ार करोड़, 90 प्रतिशत काम हो चुका है, मार्च 2028 तक पूरा करने का लक्ष्य।

फिर आता है सबसे बड़ा नाम, Gorakhpur-Siliguri Expressway Corridor। पूरा corridor 536 किलोमीटर लंबा है, लागत करीब 72 हज़ार करोड़। इसमें से 400 किलोमीटर बिहार से गुज़रेगा, अकेले इस हिस्से पर 52 हज़ार करोड़ खर्च होंगे। सात ज़िलों में ज़मीन अधिग्रहण भी शुरू हो चुका है, मतलब ये अब सिर्फ कागज़ पर नहीं, ज़मीन पर उतरना शुरू हो गया है।

Bihar Road Projects and highway development plan
Image Source: Google

Raxaul-Haldia Corridor भी कम बड़ा नहीं, छह लेन का greenfield highway, 550 किलोमीटर, लागत 45,200 करोड़। इसका 400 किलोमीटर हिस्सा बिहार में बनेगा, 26 हज़ार करोड़ की लागत से, DPR दिसंबर तक तैयार होने की उम्मीद है। Varanasi-Ranchi-Kolkata Corridor की भी यही कहानी, 600 किलोमीटर, 32 हज़ार करोड़, 35 प्रतिशत काम पूरा, जुलाई 2028 डेडलाइन। बिहार के हिस्से में इसमें 144 किलोमीटर सड़क आएगी, 13,500 करोड़ की लागत से।

पटना के आसपास भी हलचल है, 162 किलोमीटर की एक परियोजना, 10,200 करोड़ की लागत, मकसद शहर के इर्द-गिर्द के corridors को आपस में जोड़ना। साथ ही Patna-Hajipur से जुड़ा एक और प्रोजेक्ट मंज़ूर हो चुका है, 8,500 करोड़ का।

असली फायदा किसे मिलेगा

अब ज़रा सोचिए कि इस सबका मतलब आम यात्री के लिए क्या है। Raxaul-Haldia Corridor बनने के बाद वो सफर, जो अभी 20 घंटे का है, सिमटकर सिर्फ आठ घंटे का रह जाएगा। रास्ता पूर्वी चंपारण, शिवहर, सीतामढ़ी, मुज़फ्फरपुर, समस्तीपुर, बेगूसराय, लखीसराय और मुंगेर से होकर गुज़रेगा, मतलब इन सभी इलाकों को सीधा फायदा।

Varanasi-Ranchi-Kolkata Corridor का असर उससे भी बड़ा दिखता है। Varanasi से Kolkata अभी 18 घंटे का सफर है, कॉरिडोर बनने के बाद ये घटकर करीब पांच घंटे का रह जाएगा। UP, झारखंड और पश्चिम बंगाल, तीनों राज्यों की आपसी कनेक्टिविटी भी इससे बेहतर होगी।

पटना के आसपास बन रहे corridors का फायदा रोज़ के यात्रियों को सबसे पहले महसूस होगा, क्योंकि मकसद ही है ट्रैफिक, जाम और प्रदूषण में कमी लाना। लंबी दूरी वाले सफर में घंटों की बचत एक बात है, पर रोज़ सुबह-शाम जूझने वाले जाम से राहत भी उतनी ही बड़ी बात है।

इन दोनों तरह के फायदों को अलग-अलग नज़रिए से देखना ज़रूरी है। एक तरफ वो व्यापारी और किसान हैं जिनका माल अब कम समय में दूसरे राज्यों तक पहुंच पाएगा, जिससे ट्रांसपोर्ट की लागत घटेगी। दूसरी तरफ वो आम नौकरीपेशा लोग हैं, जिनके लिए रोज़ का आना-जाना थोड़ा कम थकाने वाला हो जाएगा। दोनों ही बदलाव अलग दिखते हैं, पर आखिर में दोनों एक ही चीज़ की तरफ इशारा करते हैं, बेहतर सड़कें सीधे-सीधे लोगों के समय और पैसे दोनों को बचाती हैं।

पैसा आएगा कहां से, यहीं असली दिलचस्पी है

इतनी बड़ी रकम जुटाना आसान नहीं। गडकरी ने इसके लिए एक नया तरीका सुझाया, ज़मीन के बेहतर इस्तेमाल का। सुझाव ये है कि सरकार, road corporation या urban development एजेंसियों को ज़मीन विकसित करने का अधिकार दिया जाए, और इसके लिए 60-40 का फॉर्मूला अपनाया जाए। विकसित ज़मीन का एक हिस्सा ज़मीन मालिक को मिले, एक हिस्सा सरकार को, और बाकी बचे हिस्से से प्रोजेक्ट की लागत निकाली जाए।

गडकरी के मुताबिक इस तरीके से बिना किसी अतिरिक्त सरकारी खर्च के करीब 50 से 60 हज़ार करोड़ रुपये जुटाए जा सकते हैं। ये मॉडल अगर सच में काम करता है, तो आगे चलकर बाकी राज्यों में भी इसी तरह सड़क फंडिंग का तरीका बदल सकता है, क्योंकि सरकारी खज़ाने पर सीधा बोझ डाले बिना बड़े प्रोजेक्ट चलाना किसी भी राज्य के लिए एक बड़ी राहत होगी।

कुल मिलाकर

तस्वीर साफ है। बिहार में सड़कों का एक बड़ा जाल बिछने वाला है, और इसके साथ सफर के घंटे भी धीरे-धीरे कम होते जाएंगे। कुछ प्रोजेक्ट लगभग तैयार हैं, कुछ अभी शुरुआती दौर में, और कुछ अभी सिर्फ प्रस्ताव हैं। मतलब बदलाव एक दिन में नहीं आएगा, पर दिशा साफ दिख रही है।

Bihar Road Projects and highway development plan
Image Source: Google

असली परीक्षा यही होगी कि गडकरी का ज़मीन वाला फंडिंग मॉडल कितना अच्छे से काम करता है, और ये सारे corridors तय समय-सीमा में पूरे होते हैं या नहीं। बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में देरी कोई नई बात नहीं, तो अगले कुछ सालों में इन डेडलाइन्स पर नज़र बनाए रखना दिलचस्प रहेगा। अगर ज़्यादातर प्रोजेक्ट तय वक्त पर पूरे हुए, तो आने वाले सालों में बिहार(Bihar) के भीतर और बाहर, दोनों तरफ का सफर आज से बिल्कुल अलग दिखेगा।

ट्रेन खुद ब्रेक लगा लेगी: रेलवे(Railway) के 736 करोड़ वाले चार प्रोजेक्ट में असल में क्या है

1 thought on “बिहार(Bihar) में सड़कों पर ढाई लाख करोड़ का दांव, पैसा आएगा कहां से यही सबसे दिलचस्प हिस्सा है”

Leave a Comment