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14 साल का बच्चा लोन नहीं ले सकता, पर Instagram अकाउंट बना सकता है, Supreme Court ने उठाया ये सवाल

Supreme Court Social Media Age Limit:- आपका 14 साल का बच्चा अकेले बैंक जाकर लोन नहीं ले सकता, अपने नाम पर ज़मीन नहीं खरीद सकता, गाड़ी नहीं खरीद सकता। कानून मानता है कि अभी वो इतने बड़े फैसले करने के लिए सक्षम नहीं है। पर वही बच्चा एक क्लिक में किसी सोशल मीडिया ऐप पर अकाउंट बना लेता है,

कई पन्नों की Terms and Conditions बिना पढ़े accept कर देता है, और अपना डेटा, अपनी प्राइवेसी, सब कुछ एक तरह से एक अनुबंध में सौंप देता है। सवाल यही है, जिस उम्र को कानून एक जगह इतना छोटा मानता है कि लोन तक नहीं दे सकता, वहीं दूसरी जगह उसे इतना बड़ा फैसला लेने की छूट कैसे मिल जाती है? यही विरोधाभास अब खुद Supreme Court ने पकड़ लिया है।

Supreme Court Social Media Age Limit पर क्या है पूरा मामला?

Supreme Court ने केंद्र सरकार से कहा है कि वो इस पर विचार करे कि क्या सोशल मीडिया कंपनियों को कानूनन ये सुनिश्चित करना चाहिए कि अकाउंट बनाने वाला यूज़र 18 साल का हो। ये मामला चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली तीन जजों की बेंच के सामने था, जिसमें जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल थे। सुनवाई हुई “Just Rights for Children Alliance” यानी JRCA की जनहित याचिका पर। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट को बताया कि सरकार इस मुद्दे को देखेगी, और माता-पिता की सहमति वाले तंत्र पर भी विचार हो सकता है। 

ये कोई पाबंदी नहीं है 

Supreme Court Social Media Age Limit को लेकर अभी कोई final restriction लागू नहीं हुई है। अदालत ने सरकार से इस प्रस्ताव पर विचार करने को कहा है।

ये कोई प्रतिबंध नहीं है। अदालत ने कोई अंतिम आदेश नहीं दिया, सिर्फ सरकार से इस पर विचार करने को कहा है। ये भी नहीं कहा गया कि बच्चे सोशल मीडिया से पूरी तरह कट जाएंगे, क्योंकि याचिका खुद माता-पिता या अभिभावक के नियंत्रण वाले अकाउंट के ज़रिए शैक्षिक सामग्री तक पहुंच बनाए रखने की बात करती है। कानूनी तर्क जब हम कोई अकाउंट बनाते हैं और Terms and Conditions accept करते हैं, तो असल में platform के साथ एक contract करते हैं। Indian Contract Act, 1872 की धारा 11 के मुताबिक, एक नाबालिग contract करने के लिए सक्षम ही नहीं माना जाता, और Majority Act, 1875 के तहत बालिग होने की उम्र 18 साल तय है। 

एक बाद सवाल यह भी 

तो सवाल उठता है, जो बच्चा कानूनन कोई contract कर ही नहीं सकता, वो platform की शर्तें कैसे मान सकता है? फिलहाल ज़्यादातर platforms 13 साल की उम्र से अकाउंट बनाने देते हैं, और वो भी सिर्फ यूज़र की खुद बताई गई जन्मतिथि के भरोसे। मतलब कोई भी बच्चा चाहे तो गलत साल डालकर आसानी से अकाउंट बना सकता है, इसे रोकने की कोई ठोस व्यवस्था अभी मौजूद नहीं है। 

याचिका में किन खतरों का ज़िक्र है 

Supreme Court Social Media Age Limit की बहस के पीछे बच्चों की online safety, privacy और inappropriate content जैसे मुद्दे भी महत्वपूर्ण हैं।

याचिका में जो जोखिम गिनाए गए हैं, वो गंभीर हैं। इनमें online grooming, यौन शोषण, तस्करी, sextortion, व्यवहार की profiling, निजी डेटा का दुरुपयोग, cyberbullying और उम्र के हिसाब से अनुपयुक्त कंटेंट शामिल हैं। यही वो चिंताएं हैं, जिनकी वजह से ये मुद्दा अदालत तक पहुंचा। सरकार के पास पहले से मौजूद रास्ते सरकार के पास इसके लिए रास्ते भी मौजूद हैं। बेंच ने संकेत दिया कि इसके लिए नया कानून बनाना ज़रूरी नहीं।

Supreme Court Social Media Age Limit 2026
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Information Technology Act की धारा 79, platforms को “safe harbour” सुरक्षा देती है, यानी यूज़र की पोस्ट के लिए सीधी ज़िम्मेदारी से राहत। इसी ढांचे के तहत बने intermediary नियमों में निर्देश जोड़कर platforms से कहा जा सकता है कि वो अपने सिस्टम भारतीय कानून के अनुरूप बनाएं, जिसमें 18 साल की न्यूनतम सदस्यता उम्र भी शामिल हो सकती है। केंद्र ने Digital Personal Data Protection Act, 2023 का भी ज़िक्र किया, जिसमें बच्चों के डेटा के लिए अभिभावक की सहमति का प्रावधान पहले से है। हालांकि याचिकाकर्ताओं का कहना है कि ये अकेले तुरंत समाधान नहीं देगा। चुनौतियां भी फिर भी कुछ चुनौतियां उतनी ही अहम हैं। 

उम्र का verification होगा कैसे। 

Supreme Court Social Media Age Limit लागू होती है तो सबसे बड़ी चुनौती age verification की होगी। Aadhaar, चेहरे की पहचान या दस्तावेज़ मांगने से नई privacy चिंताएं पैदा हो सकती हैं, कहीं ऐसा न हो कि बच्चों को बचाने के नाम पर सबका पहचान-डेटा platforms के पास पहुंच जाए। कहीं इलाज बीमारी से बड़ा न हो जाए। दूसरा, दुनिया भर के अनुभव बताते हैं कि ऐसी रोक को पार करना आमतौर पर उतना मुश्किल नहीं होता, चाहे वो किसी बड़े के अकाउंट के ज़रिए हो या गलत जानकारी देकर।

तीसरा, बच्चों के अपने अधिकार भी मायने रखते हैं, सूचना, अभिव्यक्ति और सीखने की पहुंच, क्योंकि बहुत से बच्चे पढ़ाई और रचनात्मक काम के लिए ही इन platforms का इस्तेमाल करते हैं। चौथा, guardian की सहमति की असलियत भी सवालों के घेरे में है, क्योंकि भारत में हर माता-पिता डिजिटल रूप से उतने जागरूक नहीं, और सहमति का तंत्र अक्सर सिर्फ एक औपचारिकता बनकर रह जाता है। 

इस कदम के पक्ष में तर्क

इस कदम के पक्ष में तर्क इस पूरे मामले को थोड़ा संतुलित नज़रिए से देखें तो इस कदम के पक्ष में तर्क मज़बूत है। मौजूदा 13 साल वाला नियम असल में पश्चिमी देशों के कानूनों से आया है, और खुद घोषित जन्मतिथि पर टिकी व्यवस्था वैसे भी बहुत कमज़ोर मानी जाती है। संविदा कानून के आधार पर तर्क देना भी दिलचस्प है, क्योंकि ये एक भावनात्मक मुद्दे को एक ठोस कानूनी सवाल में बदल देता है, जिस पर बहस करना आसान होता है। 

Supreme Court Social Media Age Limit 2026
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आगे क्या होगा 

आगे Supreme Court Social Media Age Limit को लेकर सरकार का regulatory framework और age verification mechanism महत्वपूर्ण होंगे।

अब देखना ये होगा कि सरकार इसे intermediary नियमों में संशोधन के तौर पर लाती है, या DPDP Act के तहत अभिभावक-सहमति के ढांचे में ढालती है, और age verification का तरीका आखिर में तय क्या होता है। फिलहाल के लिए इतना समझ लीजिए, ये अभी सिर्फ अदालत की एक सलाह है, कोई अंतिम फैसला नहीं। बच्चों की सुरक्षा और उनकी आज़ादी के बीच सही संतुलन ढूंढना आसान नहीं होगा, पर बहस शुरू हो चुकी है, और आने वाले महीनों में इस पर और स्पष्टता मिलने की उम्मीद है।

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