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क्या भारत(India) में फ्लाइट टिकट(Flight Ticket) सच में बहुत महंगे हैं… या हमें पूरी कहानी कभी बताई ही नहीं गई?

क्या आपने भी कभी अचानक फ्लाइट टिकट(Flight Ticket) चेक किया हो… और स्क्रीन पर ₹12,000 या ₹15,000 का किराया देखकर तुरंत लैपटॉप बंद कर दिया हो? शायद आपके मन में भी यही सवाल आया होगा कि आखिर एयरलाइंस लोगों को लूट क्यों रही हैं… लेकिन अगर मैं आपसे कहूं कि एक एयरलाइन का CEO दावा कर रहा है कि भारत में फ्लाइट टिकट दुनिया के सबसे सस्ते टिकटों में से हैं, तो क्या आप यकीन करेंगे?

क्या है असल खबर

सुनने में यह बात अजीब लगती है, क्योंकि सोशल मीडिया से लेकर न्यूज़ तक हर जगह लोग बढ़ते एयरफेयर की शिकायत करते हैं। लेकिन Akasa Air के CEO Vinay Dube का कहना है कि भारत(India) में फ्लाइट किराए उतने महंगे नहीं हैं जितना लोग समझते हैं, उनका कहना है कि अगर दुनिया के दूसरे देशों से तुलना करें तो भारतीय यात्री आज भी बहुत कम कीमत पर हवाई यात्रा कर रहे हैं।

अब सवाल उठता है कि अगर टिकट इतने सस्ते हैं, तो फिर हर किसी को वे महंगे क्यों लगते हैं| इसका जवाब सिर्फ एक टिकट की कीमत में नहीं, बल्कि उस तरीके में छिपा है जिससे एयरलाइंस अपना पूरा बिजनेस चलाती हैं। मान लीजिए आपने दिल्ली से मुंबई की फ्लाइट देखी|

भारत में फ्लाइट टिकट

अगर आपने एक महीना पहले टिकट बुक किया होता, तो शायद वही टिकट ₹3,500 या ₹4,000 में मिल जाता लेकिन अगर आपने वही टिकट दिवाली से दो दिन पहले या किसी लंबे वीकेंड पर बुक किया, तो कीमत सीधे ₹10,000 या ₹15,000 तक पहुंच सकती है। यही वजह है कि लोगों के दिमाग में हमेशा वही महंगी कीमत रह जाती है, उन्हें याद नहीं रहता कि ऑफ-सीजन में यही टिकट कई बार ट्रेन के AC First Class के बराबर या उससे भी कम कीमत में मिल जाता है।

अब आगे क्या हो सकता है

लेकिन इसके पीछे सिर्फ त्योहारों की भीड़ जिम्मेदार नहीं है एयरलाइंस आज Dynamic Pricing मॉडल पर काम करती हैं। यानी जैसे-जैसे विमान की सीटें भरती जाती हैं, सिस्टम अपने आप किराया बढ़ाता जाता है हो सकता है कि पहली सीट ₹3,000 में बिकी हो, लेकिन आखिरी सीट किसी यात्री को ₹12,000 में मिले ये कोई भारतीय मॉडल नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया की एयरलाइंस इसी सिस्टम का इस्तेमाल करती हैं।

अब यहां एक और दिलचस्प सवाल आता है कि अगर एयरलाइंस इतनी कम कीमत पर टिकट बेच रही हैं, तो फिर उन्हें फायदा कैसे होता है? असल में कई बार फायदा होता ही नहीं पिछले कुछ सालों में भारत की एविएशन इंडस्ट्री ने कई बड़े झटके देखे हैं Go First जैसी एयरलाइन बंद हो गई, कई कंपनियों के विमान इंजन की तकनीकी समस्याओं की वजह से महीनों तक जमीन पर खड़े रहे। 

Boeing और Airbus समय पर नए विमान नहीं दे पा रहे हैं दूसरी तरफ यात्रियों की संख्या लगातार बढ़ रही है यानी मांग ज्यादा है, लेकिन सीटें कम है, जब किसी भी बाजार में यही स्थिति बनती है, तो कीमतें ऊपर जाना लगभग तय होता है।

लेकिन Akasa Air के CEO की बात का सबसे अहम हिस्सा अभी बाकी है उनका कहना है कि लोग सिर्फ टिकट की कीमत देखते हैं, लेकिन एयरलाइंस की लागत नहीं देखते। भारत में Aviation Turbine Fuel यानी ATF पर दुनिया के कई देशों की तुलना में ज्यादा टैक्स लगता है, इसके अलावा एयरपोर्ट चार्ज, नेविगेशन फीस, मेंटेनेंस, स्टाफ कॉस्ट और विमान लीज पर लेने का खर्च भी लगातार बढ़ रहा है… इन सबके बावजूद अगर एयरलाइंस किराया बहुत ज्यादा नहीं बढ़ा रहीं, तो इसका मतलब है कि उनका मार्जिन उतना बड़ा नहीं है जितना लोग समझते हैं।

लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि यात्रियों की शिकायतें गलत हैं? बिल्कुल नहीं।

अब आगे क्या हो सकता है

यहीं पूरी बहस का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा शुरू होता है अगर कोई व्यक्ति महीने के ₹30,000 कमाता है और उसे एक घरेलू फ्लाइट के लिए ₹6,000 खर्च करने पड़ें, तो उसकी एक महीने की आय का लगभग 20 प्रतिशत सिर्फ एक यात्रा पर चला गया। अब यही तुलना अगर अमेरिका या यूरोप से करें, तो वहां टिकट महंगा हो सकता है, लेकिन लोगों की औसत आय भी कई गुना ज्यादा होती है इसलिए वहां वही टिकट उनकी जेब पर उतना भारी नहीं पड़ता जितना भारत में पड़ता है।

यानी Akasa Air का दावा अंतरराष्ट्रीय तुलना में सही हो सकता है, लेकिन भारतीय यात्रियों की परेशानी भी पूरी तरह जायज है। असली समस्या सिर्फ टिकट की कीमत नहीं, बल्कि भारत की प्रति व्यक्ति आय और लोगों की खरीदने की क्षमता है यही वजह है कि एक ही टिकट एयरलाइन को सस्ता और यात्री को महंगा महसूस होता है।

भारत में फ्लाइट टिकट

इलेक्ट्रिक कारों की मांग में तेजी, भारतीय बाजार में बढ़ रही प्रतिस्पर्धा

अब आगे क्या हो सकता है

अगले दो-तीन वर्षों में IndiGo, Air India और Akasa Air सैकड़ों नए विमान अपने बेड़े में शामिल करने की तैयारी कर रही हैं, नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट और नवी मुंबई एयरपोर्ट जैसे बड़े प्रोजेक्ट भी शुरू होंगे। अगर विमान ज्यादा आए, सीटों की संख्या बढ़ी और प्रतिस्पर्धा तेज हुई, तो कई रूट्स पर किराए में राहत देखने को मिल सकती है लेकिन अगर ईंधन की कीमतें बढ़ती हैं, टैक्स ऊंचे बने रहते हैं या विमानों की डिलीवरी में देरी जारी रहती है, तो टिकट सस्ते होने की उम्मीद भी उतनी आसान नहीं होगी।

तो अगली बार जब आपको फ्लाइट टिकट महंगा लगे, तो सिर्फ यह मत सोचिए कि एयरलाइन ज्यादा पैसे कमा रही है। यह भी सोचिए कि उस टिकट की कीमत के पीछे ईंधन, टैक्स, विमान की कमी, बढ़ती मांग और आपकी अपनी खरीदने की क्षमता इन सभी का कितना बड़ा रोल है, क्योंकि सच शायद इतना आसान नहीं है कि फ्लाइट टिकट(Flight Ticket) महंगे हैं… असली सवाल यह है कि क्या हमारी कमाई इतनी है कि हमें वे सस्ते लगें?

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