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भारत का पहला Finance Minister(R K Shanmukham Chetty) और Nehru से उसका विवाद: पूरी कहानी

26 नवंबर 1947। देश को आज़ाद हुए सिर्फ़ 103 दिन हुए थे। भारत Partition के घाव से गुजर रहा था-लाखों लोग विस्थापित हो चुके थे, खाने की कमी थी, महंगाई बढ़ रही थी, विदेशी मुद्रा सीमित थी और कश्मीर में युद्ध शुरू हो चुका था। इसी वक्त संसद में एक आदमी खड़ा हुआ और उसने कहा-“I rise to present the first Budget of a free and independent India.” वह आदमी था R. K. Shanmukham Chetty। लेकिन Chetty की कहानी सिर्फ़ भारत का पहला Budget पेश करने वाले Finance Minister की कहानी नहीं है।

यह एक ऐसे आदमी की कहानी है जो Congress का सदस्य नहीं था, Justice Party और Swaraj Party से जुड़ा रहा था, Central Legislative Assembly का President रह चुका था, Cochin का Dewan रह चुका था और Bretton Woods Conference में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुका था। फिर सवाल उठता है-आखिर Nehru ने अपनी पहली Cabinet में Finance Ministry ऐसे व्यक्ति को क्यों दी, जो उनकी पार्टी का हिस्सा तक नहीं था?

R K Shanmukham Chetty कौन थे?

Ramasamy Chetty Kandasamy Shanmukham Chetty का जन्म 17 अक्टूबर 1892 को Coimbatore में हुआ था। उन्होंने Madras Christian College से पढ़ाई की और बाद में Law की शिक्षा ली। 1920 के दशक में वे Central Legislative Assembly पहुंचे और 1933 में उसके President बने। 1935 से 1941 तक उन्होंने Cochin के Dewan के रूप में काम किया और 1944 में Bretton Woods Conference में भारतीय delegation का हिस्सा बने। यानी 1947 में जब Nehru को Finance Minister चुनना था, तब उनके सामने कोई अनुभवहीन नेता नहीं, बल्कि legislature, administration और international finance-तीनों का अनुभव रखने वाला व्यक्ति था।

Congress के बाहर से आए Finance Minister को Nehru ने क्यों चुना? 

15 अगस्त 1947 को India स्वतंत्र हुआ और Nehru की पहली Cabinet में Finance Ministry Chetty को मिली। उनका पहला काम था एक ऐसे देश की आर्थिक स्थिति संभालना जिसकी सीमाएं अभी-अभी बदली थीं। Partition ने केवल लोगों को नहीं बाँटा था; उसने revenue, assets, liabilities, trade routes और administrative machinery तक को प्रभावित किया था। ऊपर से refugee crisis था। Chetty के पहले Budget में refugees की evacuation और relief के लिए ₹22 करोड़ का प्रावधान था, imported foodgrains पर subsidy के लिए लगभग ₹22.5 करोड़ और Defence पर भी भारी खर्च रखा गया। इसलिए आज़ाद भारत का पहला Budget किसी सामान्य development Budget की तरह नहीं था-यह एक crisis budget था।

26 नवंबर 1947: जब संसद में पेश हुआ आज़ाद भारत का पहला Budget 

26 नवंबर 1947 को Chetty ने पहला Budget पेश किया। यह पूरा financial year नहीं था, बल्कि 15 अगस्त 1947 से 31 मार्च 1948 तक के साढ़े सात महीनों के लिए था। शुरुआती अनुमान में deficit ₹26.24 करोड़ था। Refugee relief, food subsidies और बढ़े हुए defence expenditure जैसे extraordinary खर्चों के बीच Chetty ने माना कि पूरे deficit को तुरंत additional taxation से भरना उचित नहीं होगा। कुछ revenue measures के बाद final deficit ₹24.59 करोड़ रह गया। लेकिन Chetty केवल deficit management नहीं कर रहे थे। उनकी economic philosophy में private enterprise, savings और industrial investment का महत्वपूर्ण स्थान था।

1948–49 के Budget में उन्होंने Business Profits Tax की दर 16 प्रतिशत से घटाकर 10 प्रतिशत करने का प्रस्ताव रखा और super-tax में भी राहत दी, क्योंकि उनका तर्क था कि अत्यधिक taxation savings और industrial investment को नुकसान पहुंचा सकता है। यानी उनका मॉडल था-राज्य की जरूरतें पूरी हों, welfare और reconstruction पर खर्च हो, लेकिन productive economy को इतना न दबाया जाए कि industry और investment ही कमजोर पड़ जाएं।

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Chetty की Economic Philosophy: Tax कम, Investment ज़्यादा 

Chetty के सामने food security और foreign exchange की समस्या भी थी। भारत को foodgrains import करने पड़ रहे थे और हर import के साथ विदेशी मुद्रा खर्च हो रही थी। Chetty को चिंता थी कि अगर भारत लगातार food imports पर निर्भर रहा, तो वही foreign exchange industrialisation और development के लिए उपलब्ध नहीं रहेगा। उन्होंने inflation को भी गंभीर समस्या माना। उनके अनुसार purchasing power बढ़ी हुई थी, लेकिन production उस अनुपात में नहीं बढ़ा था। इसलिए उनकी आर्थिक सोच में inflation, production, foreign exchange और investment एक-दूसरे से जुड़े हुए थे।

28 फरवरी 1948 को R K Shanmukham Chetty ने अपना दूसरा और पहला full-year Budget पेश किया। 1948–49 के लिए revenue estimate लगभग ₹230.52 करोड़ और revenue expenditure लगभग ₹257.37 करोड़ था। लेकिन अंतिम tax proposals के बाद uncovered deficit घटकर लगभग ₹1.09 करोड़ रह गया। Development को भी पूरी तरह पीछे नहीं धकेला गया-provinces के लिए grants और loans, central development schemes और rehabilitation के लिए allocations रखे गए। इसलिए Chetty को केवल austerity के Finance Minister के रूप में देखना सही नहीं होगा। वह एक ऐसी mixed economic approach की वकालत कर रहे थे जिसमें state spending और social reconstruction के साथ private savings और industrial growth भी जरूरी थे।

एक साल बाद क्यों चली गई Finance Ministry? 

लेकिन फिर कहानी अचानक बदलती है। सिर्फ़ एक साल बाद, अगस्त 1948 में R K Shanmukham Chetty को Finance Ministry छोड़नी पड़ी। और यहीं से उनके राजनीतिक जीवन का सबसे विवादित अध्याय शुरू होता है। मामला था Income-Tax Investigation Commission का। कुछ income-tax cases Commission के सामने भेजे गए थे और बाद में उनमें से कुछ cases वापस लेने का निर्णय हुआ। Nehru को इस पर गंभीर आपत्ति थी। 

Nehru का पत्र: “Grave Error of Judgment” 

16 अगस्त 1948 को Chetty को लिखे अपने पत्र में Nehru ने साफ़ किया कि उन्हें Chetty की bona fides पर संदेह नहीं था, लेकिन जिस तरह इन मामलों को handle किया गया, उसे उन्होंने “grave error of judgment” माना। मामला उस समय और संवेदनशील हो गया क्योंकि Parliament एक संबंधित legislative amendment पर विचार कर रही थी।

Nehru के अनुसार ऐसे मामलों को Commission से वापस लेने जैसे कदम Parliament की जानकारी और consent के बिना नहीं होने चाहिए थे। अगले ही दिन Chetty ने इस्तीफ़ा दे दिया। इसलिए यह कहना कि Chetty को किसी सिद्ध corruption case में Finance Minister पद से हटा दिया गया था, primary evidence से समर्थित नहीं है। असली विवाद ministerial judgment, parliamentary procedure और income-tax investigations को लेकर था।

फिर भी इस कहानी में एक और दिलचस्प परत है। बाद के कुछ accounts में Chetty पर mill-owners को favour करने जैसे आरोपों का उल्लेख मिलता है, हालांकि इन आरोपों की निर्णायक पुष्टि नहीं हुई है। यही वजह है कि Chetty की कहानी को केवल “Nehru ने Finance Minister को हटा दिया” कहकर खत्म करना भी अधूरा होगा। एक तरफ़ वे Congress के बाहर से आए Finance Minister थे, दूसरी तरफ़ उनकी economic thinking private enterprise और industrial interests के प्रति अपेक्षाकृत sympathetic थी, और तीसरी तरफ़ उनका कार्यकाल ऐसे tax-investigation controversy के बीच खत्म हुआ जिसने Nehru सरकार में ministerial accountability का सवाल खड़ा कर दिया।

Gandhi ने Chetty का नाम सुझाया था? Myth या Fact? 

और शायद सबसे sensational सवाल यही है-क्या Chetty और Nehru के बीच शुरू से ही ideological या personal tension थी? इसका जवाब इतना सीधा नहीं है। एक लोकप्रिय कहानी यह जरूर कहती है कि Gandhi Chetty के नाम के पक्ष में थे जबकि Nehru उनसे पूरी तरह सहज नहीं थे, लेकिन इस दावे को निर्णायक रूप से साबित करने वाला मजबूत primary evidence उपलब्ध नहीं है। इसलिए इसे established fact की तरह कहना ठीक नहीं होगा। हकीकत शायद इससे ज्यादा interesting है: Nehru की पहली Cabinet केवल Congress loyalists की Cabinet नहीं थी। उसमें अलग-अलग राजनीतिक और आर्थिक धाराओं के लोगों को शामिल किया गया था और Chetty उनमें सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण थे।

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क्यों R. K. Shanmukham Chetty को याद करना जरूरी है? 

R. K. Shanmukham Chetty के बाद K. C. Neogy थोड़े समय के लिए Finance Minister बने और फिर John Matthai आए। Chetty का नाम धीरे-धीरे public memory से गायब होता गया। लेकिन अगर आज़ाद भारत की शुरुआती economic policy को समझना है, तो Chetty को सिर्फ़ “भारत का पहला Budget पेश करने वाला Finance Minister” कहना उनके साथ अन्याय होगा।

वह उस संक्रमणकाल के प्रतिनिधि थे जिसमें भारत को एक साथ refugee crisis, food shortage, inflation, defence expenditure, foreign exchange और industrial development से निपटना था। और उनका एक साल का कार्यकाल यह भी दिखाता है कि आज़ादी के तुरंत बाद भारत की आर्थिक दिशा को लेकर बहस कितनी जटिल थी-राज्य कितना हस्तक्षेप करे, private enterprise को कितनी जगह मिले और Finance Minister की राजनीतिक जवाबदेही आखिर किस सीमा तक हो।

Chetty की कहानी इसलिए सिर्फ़ India’s first Budget की कहानी नहीं है; यह उस सवाल की शुरुआत है कि आज़ाद भारत की economy आखिर किस रास्ते पर चलेगी। Chetty का जवाब पूरी तरह socialist नहीं था, पूरी तरह laissez-faire भी नहीं। उनका जोर था-राज्य की जरूरतें पूरी हों, गरीब पर अनावश्यक बोझ न पड़े, industry बढ़े, savings बढ़ें, production बढ़े और भारत अपनी आर्थिक निर्भरता कम करे। शायद इसी वजह से R. K. Shanmukham Chetty की कहानी सिर्फ़ भारत के पहले Finance Minister की कहानी नहीं है। यह उस आर्थिक बहस की शुरुआत है, जिसका जवाब भारत आज भी अपनी economic policy में खोज रहा है।

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