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चीनी(Sugar) क्यों हुई महंगी? पेट्रोल सस्ता करने वाली एथेनॉल नीति का क्या है मीठा कनेक्शन?

Sugar Price Hike in India ने आम आदमी की रसोई से लेकर सरकार की Ethanol Policy तक कई सवाल खड़े कर दिए हैं। चीनी की कीमत आखिर क्यों बढ़ रही है और पेट्रोल में ethanol blending का इससे क्या connection है?

सरकार चली थी पेट्रोल सस्ता करने, पर आपके किचन में पड़ी चीनी महंगी कैसे हो गई…गन्ने से बनी एथेनॉल ने आपकी थाली से मिठास क्यों कम कर दी…क्या डायबिटीज कम करने के लिए ये सरकार का नया मास्टरस्ट्रोक है, या फिर किसी कंपनी का प्रॉफिट बढ़ाने में हुई गलती…महंगी चीनी(Sugar) की बहस में आखिर एथेनॉल की एंट्री क्यों हुई और इस दिवाली आपके घर काजू कतली आखिर कितने की आ पाएगी…

2021 की एक ख़बर। भारत ने उस एक साल में दुनिया भर को करीब सवा करोड़ टन चीनी(Sugar) बेची। दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चीनी एक्सपोर्टर। पांच साल बाद, अगस्त 2026। वही भारत, विदेश से चीनी मंगाने का ऑर्डर देता है। पूरे एक दशक में पहली बार।

सवाल सीधा है  जो देश चीनी(Sugar) बेच रहा था, वो अचानक खरीदने पर क्यों आ गया? और क्या इसकी वजह उतनी ही सीधी है, जितनी सोशल मीडिया पर बताई जा रही है?

20 जुलाई को देश में चीनी(Sugar) का औसत रिटेल रेट था ₹48.18 प्रति किलो। ठीक एक महीने बाद, 20 अगस्त को यह पहुंच गया ₹55.70 प्रति किलो  करीब साढ़े 15 प्रतिशत की बढ़त, सिर्फ एक महीने में। मंडियों का थोक भाव तो और तेज़ चढ़ा  पिछले साल के करीब ₹3,900 प्रति क्विंटल से बढ़कर अब ₹5,400 से ₹5,500 तक।

और टाइमिंग देखिए  यह ठीक उसी मौसम में हो रहा है जब देश गणेश चतुर्थी, दशहरा और दिवाली की तैयारी में जुटा है। जब हर दूसरे घर में मिठाई बनती है। जो चीज़ महंगी हुई है, वो सिर्फ एक commodity नहीं  त्यौहार की थाली का हिस्सा है।

कहानी को समझने के लिए थोड़ा पीछे चलना होगा

भारत अपनी ज़रूरत का करीब 88.5 प्रतिशत कच्चा तेल बाहर से मंगाता है। इसी निर्भरता को कम करने के लिए एक रणनीति बनी  पेट्रोल में एथेनॉल मिलाओ। गन्ने से एथेनॉल बनेगा, विदेशी मुद्रा बचेगी, किसान को नई कमाई मिलेगी, चीनी मिलों को नया रेवेन्यू मिलेगा।

सरकार का अपना दावा है  2014-15 से अब तक इस प्रोग्राम ने करीब ₹1.9 लाख करोड़ की विदेशी मुद्रा बचाई है। लक्ष्य था पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल  यानी E20 और भारत उस लक्ष्य तक पहुंच भी गया।

लेकिन गन्ना एक ही है। और उससे बनता है  या तो चीनी, या एथेनॉल। दोनों एक साथ, उतनी ही मात्रा में नहीं बन सकते।

Sugar Price Hike in India due to ethanol policy and lower sugar production
Image Source: Google

यहीं से असली सवाल शुरू होता है।

20 अगस्त 2026 को सरकार ने बड़ा फैसला लिया 10 लाख टन कच्ची चीनी, बिना किसी इम्पोर्ट ड्यूटी के, 31 अक्टूबर तक मंगाने की इजाज़त। आम तौर पर इस पर 100 प्रतिशत ड्यूटी लगती है। यह छूट करीब एक दशक में पहली बार दी गई है।

सोचिए  जो देश गन्ने के सबसे बड़े उत्पादकों में गिना जाता है, उसे अपने ही बाज़ार के लिए बाहर से चीनी मंगानी पड़ रही है।

यही वो irony है, जिसने पूरे मामले को राजनीतिक बना दिया।

इम्पोर्ट का ऐलान होते ही आलोचना शुरू हो गई।

आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल ने उसी दिन X पर पोस्ट किया और वीडियो जारी किया आरोप लगाया कि विदेशी मुद्रा बचाने के लिए गन्ने से एथेनॉल बनवाया गया, और अब उसी विदेशी मुद्रा को खर्च करके चीनी मंगानी पड़ रही है। उन्होंने सरकार पर तीखा तंज़ भी कसा। कांग्रेस ने भी मध्य प्रदेश में सड़कों पर उतरकर चीनी के पैकेट बांटे और महंगाई को लेकर सरकार को घेरा।

और यहां एक और दिलचस्प एंगल है  जिस हफ़्ते आम आदमी की रसोई का बजट बिगड़ा, उसी हफ़्ते बलरामपुर चीनी, धामपुर शुगर, द्वारिकेश और बजाज हिंदुस्तान जैसी चीनी कंपनियों के शेयर 6 से 8 प्रतिशत तक उछल गए। यानी एक ही खबर, किसी के लिए संकट, किसी के लिए मुनाफ़ा।

और यह सवाल सिर्फ दिल्ली तक सीमित नहीं रहा। बिहार में जब पत्रकारों ने बढ़ती चीनी की कीमत पर सवाल पूछा, तो वहां के एक मंत्री श्रवण कुमार ने जवाब दिया कि आजकल वैसे भी लोग कम चीनी खाते हैं, क्योंकि बहुत से लोगों को डायबिटीज है। यह बयान वायरल हो गया और तीखी आलोचना का शिकार बना।

बवाल बढ़ा, तो सत्ताधारी गठबंधन के ही एक और मंत्री, विजय कुमार सिन्हा, सफाई देने मैदान में उतरे। उन्होंने कहा कि कीमत में इतनी बढ़ोतरी आख़िर क्यों हुई, इसकी जांच होगी और संबंधित विभाग से जानकारी ली जाएगी। लेकिन साथ में यह भी जोड़ दिया कि जब किसानों की उपज की कीमत बढ़ती है, तो उन्हें व्यक्तिगत तौर पर खुशी होती है।

लेकिन क्या कहानी सच में इतनी ही सीधी है?

21 अगस्त को उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय ने सीधा जवाब दिया, और तीन बड़े आंकड़े रखे।

पहला एथेनॉल के लिए चीनी(Sugar) का डायवर्जन घटा है, बढ़ा नहीं। 2022-23 में यह करीब 12 प्रतिशत था। 2025-26 में घटकर करीब 9 प्रतिशत रह गया। और अब देश का करीब तीन-चौथाई एथेनॉल गन्ने से नहीं, बल्कि मक्के जैसे अनाज से बन रहा है।

दूसरा, और शायद असली वजह  शुरुआती अनुमान था कि इस सीज़न में करीब 343 लाख टन चीनी बनेगी। असल आंकड़ा आया करीब 306 लाख टन  यानी करीब 37 लाख टन की सीधी कमी, 10 प्रतिशत से ज़्यादा। वजह बताई गई  रेड रॉट और टॉप बोरर नाम की बीमारियां, और भारी बारिश से खेतों में भरा पानी।

तीसरा  सरकार कहती है, ग्लोबल मार्केट में भी हालात आसान नहीं। 2026-27 के लिए दुनिया भर में करीब 33 लाख टन की कमी का अनुमान है, और अंतरराष्ट्रीय कीमतें भी दो महीने में 16 प्रतिशत से ज़्यादा बढ़ चुकी हैं।

यानी सरकार की दलील है  मुख्य वजह एथेनॉल नहीं, बल्कि कम उत्पादन, खराब मौसम, त्यौहारी मांग, ग्लोबल कीमतें और कुछ हद तक जमाखोरी है।

लेकिन यहां एक पेच है।

अगर एथेनॉल का हिस्सा सच में इतना छोटा है और घट भी रहा है, तो फिर सरकार खुद अगले सीज़न के लिए गन्ने से एथेनॉल बनाने पर सीमाएं लगाने पर विचार क्यों कर रही है, ताकि चीनी की उपलब्धता बढ़े?

ईमानदार निष्कर्ष शायद यह है  एथेनॉल नीति ने गन्ने के बंटवारे को structurally ज़रूर प्रभावित किया है, लेकिन मौजूदा सबूत यह नहीं दिखाते कि अगस्त 2026 की इस उछाल की वो अकेली या मुख्य वजह है। असली वजह  उत्पादन में आई अचानक और बड़ी कमी  कहीं ज़्यादा बड़ी दिखती है।

Sugar Price Hike in India due to ethanol policy and lower sugar production
Image Source: Goolge
इसका मतलब आम आदमी के लिए क्या है?

सरकार ने इम्पोर्ट के साथ-साथ जमाखोरी रोकने के लिए स्टॉक लिमिट लगाई है, मिलों में फिज़िकल वेरिफिकेशन शुरू किया है, और मिलों को अक्टूबर के बजाय जल्दी पेराई शुरू करने को कहा है। मकसद एक ही है  दिवाली से पहले बाज़ार में चीनी की मात्रा बढ़ाना।

लेकिन असली टेस्ट अभी बाकी है  मंगाई गई चीनी(Sugar) बंदरगाह से बाज़ार तक कितनी तेज़ी से पहुंचती है, और नया गन्ना सीज़न कैसा रहता है।

तो अगली बार जब आप चाय में चीनी डालें, तो याद रखिए  वो सिर्फ एक किलो का पैकेट नहीं है। वो उस बहस का हिस्सा है जो तय कर रही है कि हमारी खेती की ज़मीन पहले पेट्रोल की टंकी भरे, या पहले थाली। और यह सवाल सिर्फ इस साल का नहीं है।

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