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क्या डॉलर का राज कमज़ोर पड़ रहा है? BRICS Summit से निकली असली बात

दिल्ली में इन दिनों BRICS देशों की समिट चल रही है, और इस बार बात सिर्फ फोटो खिंचवाने और हाथ मिलाने तक सीमित नहीं रही। सीधी नज़र गई है डॉलर की ताकत पर। जब भी दुनिया की उभरती हुई बड़ी अर्थव्यवस्थाएं एक साथ बैठती हैं, तो अमेरिका थोड़ा सतर्क हो जाता है। इस बार भी वैसा ही कुछ देखने को मिल रहा है।

BRICS Summit 2026 में असल चर्चा किस बात पर हो रही है?

कई जगह ये बात उड़ रही थी कि BRICS देश अपनी साझा करेंसी लॉन्च करने वाले हैं। ऐसा कुछ नहीं हो रहा। विदेश मंत्रालय में आर्थिक मामलों के सचिव सुधाकर दलेला ने खुद साफ कर दिया है कि फिलहाल ऐसा कोई प्रस्ताव सामने नहीं है। तो जो लोग सोच रहे थे कि कल से किसी नई “BRICS Currency” से सामान खरीदेंगे, उन्हें थोड़ा इंतजार करना पड़ेगा, फिलहाल ऐसा कुछ होने वाला नहीं है।

तो हो क्या रहा है असल में

असली बात है स्थानीय करेंसी में आपस का व्यापार निपटाने की। मतलब अगर भारत और कोई दूसरा BRICS देश आपस में सामान खरीदते-बेचते हैं, तो उसका पेमेंट डॉलर के बजाय दोनों देशों की अपनी करेंसी में हो सके। दलेला के मुताबिक इस पर सदस्य देशों के बीच काफी समय से बातचीत चल रही है, और मकसद है व्यापार की लागत कम करना, न कि दुनिया के मौजूदा पेमेंट सिस्टम को चुनौती देना। शनिवार को जारी हुई न्यू दिल्ली डिक्लेरेशन में भी इसी दिशा में हो रही बातचीत का ज़िक्र है।

BRICS Summit 2026 और डॉलर की वैश्विक ताकत पर चर्चा
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इसे “डी-डॉलराइज़ेशन” कहा जा रहा है, यानी दुनिया के व्यापार में डॉलर की जो लगभग अकेली पकड़ है, उसे धीरे-धीरे कम करना। पिछले कई दशकों से दुनिया का ज्यादातर व्यापार डॉलर में ही होता आया है, चाहे दोनों देश अमेरिका से जुड़े हों या न हों। इसका फायदा अमेरिका को यह मिलता है कि उसकी करेंसी की मांग हमेशा बनी रहती है, और उसे अपने खर्चों के लिए पैसा जुटाना आसान पड़ता है। BRICS देश इसी पर सवाल उठा रहे हैं, हालांकि अभी तक ये सिर्फ बातचीत के स्तर पर है, कोई बड़ा ठोस फैसला नहीं हुआ है।

भारत के UPI का उदाहरण और गोयल की अपील

कॉमर्स और इंडस्ट्री मिनिस्टर पीयूष गोयल ने BRICS बिज़नेस फोरम में एक अपील की सदस्य देश अपने पेमेंट सिस्टम आपस में जोड़ें और स्थानीय करेंसी में व्यापार बढ़ाएं। उन्होंने अपने UPI का उदाहरण दिया, जो अब ग्यारह देशों में स्वीकार किया जाता है। सोचिए, जब दुनियाभर के लोग भारत के UPI से अपने रोज़मर्रा के काम निपटाने लगें, तो इसका असर धीरे-धीरे डॉलर की पकड़ पर भी पड़ना शुरू हो सकता है।

अमेरिका इतना चौकन्ना क्यों है

ये घबराहट सिर्फ अंदाज़ा नहीं है, अमेरिका इस मामले में पहले से ही सतर्क बैठा है। नवंबर 2024 में ट्रंप ने खुद चेतावनी दी थी कि अगर BRICS देश कोई नई करेंसी बनाते हैं या डॉलर के किसी विकल्प को बढ़ावा देते हैं, तो उन पर सौ प्रतिशत तक टैरिफ लगा दिया जाएगा। अब जरा सोचिए, दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के पास इतनी ताकत होने के बावजूद, सिर्फ एक बैठक से इतनी घबराहट क्यों? इसकी एक वजह ये भी हो सकती है कि डॉलर की मजबूती अमेरिका के लिए सिर्फ एक करेंसी की बात नहीं, बल्कि पूरी दुनिया पर उसकी पकड़ बनाए रखने का एक बड़ा हथियार है।

भारत के व्यापारियों के लिए इसमें क्या है

अब बात करते हैं उस हिस्से की जो सीधे आम व्यापारियों से जुड़ा है। कैट, यानी कॉन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स, ने इस समिट को भारत के लिए एक बड़ा मौका बताया है। कैट के महासचिव और सांसद प्रवीण खंडेलवाल और संयुक्त महामंत्री सुरेश सोंथालिया का कहना है कि BRICS भारत की बढ़ती वैश्विक पहचान को व्यापारियों, छोटे-मझोले उद्योगों, स्टार्टअप और निर्यातकों के लिए असली मौकों में बदलने का एक अच्छा जरिया बन सकता है।

कैट ने यहीं नहीं रुककर एक “BRICS ट्रेड कनेक्ट मिशन” बनाने का प्रस्ताव भी रखा है। इसका मकसद है सदस्य देशों के बीच व्यापारिक सहयोग को एक संगठित रूप देना भारतीय व्यापारियों को विदेशी बाज़ारों से जोड़ना, निर्यात के नए मौके ढूंढना, और लॉजिस्टिक यानी माल भेजने-मंगाने के काम में मदद पहुंचाना। मतलब सिर्फ बातचीत नहीं, इस बार एक ढांचा खड़ा करने की तैयारी है।

यहां एक बात समझनी ज़रूरी है कि छोटे और मझोले व्यापारियों के लिए विदेश में बाज़ार ढूंढना, वहां के नियम-कायदे समझना और सही खरीदार तक पहुंचना अक्सर सबसे मुश्किल काम होता है। बड़ी कंपनियों के पास इसके लिए अलग टीम और पैसा होता है, पर छोटे व्यापारी अक्सर इसी वजह से पीछे रह जाते हैं। अगर कैट का ये मिशन असल में जमीन पर उतरता है, तो इसका सबसे ज्यादा फायदा इन्हीं छोटे कारोबारियों को मिल सकता है, जो अभी तक सिर्फ घरेलू बाज़ार तक सीमित थे।

किन क्षेत्रों को फायदा मिल सकता है

कैट के चेयरमैन बृजमोहन अग्रवाल के मुताबिक कपड़ा, दवाइयां, इंजीनियरिंग, फूड प्रोसेसिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स, हस्तशिल्प, कंज्यूमर गुड्स, सर्विसेज़ और डिजिटल कॉमर्स जैसे क्षेत्रों को इसका खास फायदा मिल सकता है। सोंथालिया का कहना है कि भारत की उद्यमशीलता, मजबूत मैन्युफैक्चरिंग बेस और तकनीकी नवाचार उसे BRICS देशों में एक अलग ही जगह दिलाते हैं।

आखिर में बात इतनी है

एक तरफ दिल्ली में बैठकर दुनिया के बड़े नेता डॉलर की बादशाहत को धीरे-धीरे चुनौती देने की बात कर रहे हैं, दूसरी तरफ हमारे अपने व्यापारी इस मौके का पूरा फायदा उठाने की तैयारी में जुट गए हैं। ये अभी शुरुआत है, कोई बड़ा तुरंत बदलाव नहीं आने वाला। न डॉलर कल खत्म होगा, न रुपया रातोंरात दुनिया की करेंसी बन जाएगा।

BRICS Summit 2026 और डॉलर की वैश्विक ताकत पर चर्चा
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पर इतना ज़रूर है कि जिस दिशा में बातचीत चल रही है, वो लंबे समय में डॉलर की पकड़ को थोड़ा ढीला कर सकती है, और भारत जैसे देशों को अपनी करेंसी की ताकत बढ़ाने का मौका दे सकती है। ये आने वाला वक्त ही बताएगा कि ये पूरी कवायद कोई बड़ा बदलाव साबित होती है, या सिर्फ एक और समिट की बातचीत बनकर रह जाती है। पर इतना तय है कि इस बार दिल्ली में हुई ये बातें सिर्फ कूटनीति तक सीमित नहीं रहीं, इनका असर सीधे वैश्विक अर्थव्यवस्था तक जाकर टकराया है।

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