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Iran पर नए Sanctions और भारत की Economy: कहानी उतनी सीधी नहीं जितनी दिख रही है

24 अगस्त की सुबह जब Indian market खुला, तो सतह पर सब कुछ शांत लग रहा था। न कोई बड़ी गिरावट, न कोई तेज उछाल। बस एक flat, ठहरा हुआ trade, जैसे कोई गहरी सांस लेकर अगली खबर का इंतजार कर रहा हो और असल में यही हो भी रहा था कि पूरा market अमेरिका की तरफ देख रहा था, जहां Treasury Secretary Scott Bessent Iran पर नए sanctions की details सामने रखने वाले थे। अमेरिका खुद इन्हें इतिहास के सबसे सख्त sanctions बता रहा है। अब सवाल यह है कि इसका भारत से क्या लेना-देना? जवाब उतना दूर का नहीं है जितना लगता है।

असली डर Iran नहीं, crude oil है

भारत को सीधे इन sanctions से कुछ खास फर्क नहीं पड़ता। हमारी चिंता की जड़ कहीं और है, Iran ने खुला संकेत दे दिया है कि अगर दबाव बढ़ा तो वह Gulf से oil की supply रोकने की कोशिश कर सकता है। और यहीं से भारत की मुश्किल शुरू होती है, क्योंकि हमारी बहुत बड़ी crude जरूरत आयात से पूरी होती है।

सोचिए इस चेन को इस तरह sanctions सख्त होते हैं, oil supply पर सवाल उठता है, crude का दाम बढ़ता है, भारत का import bill भारी होता है, dollar की मांग बढ़ती है, रुपया कमजोर पड़ता है, महंगाई का डर सिर उठाता है, और आखिर में RBI के लिए rate cut जैसा कोई भी नरम फैसला लेना मुश्किल हो जाता है। एक geopolitical headline कैसे घूमते-घूमते आपकी जेब तक पहुंच जाती है, यही इसकी सबसे दिलचस्प और थोड़ी डरावनी बात है।

तो फिर crude आज गिरा क्यों?

यहीं पर चीज़ें थोड़ी उलझ जाती हैं। sanctions की खबर के बावजूद सोमवार को crude oil की कीमतें करीब एक प्रतिशत से ज्यादा नीचे आईं। ऐसा नहीं है कि market को लगने लगा हो कि Iran संकट खत्म हो गया बल्कि लगता है traders पहले की तेजी के बाद मुनाफा काट रहे हैं, और असली sanctions details आने से पहले कोई बड़ा दांव लगाने से बच रहे हैं। असली टेस्ट अभी बाकी है अगर supply वाकई प्रभावित नहीं होती, तो crude में बड़ा उछाल जरूरी नहीं। लेकिन अगर Iran जवाबी कदम उठाता है, तो तस्वीर घंटों में बदल सकती है।

रुपये की कहानी: दबाव भी, कुशन भी

रुपया शुक्रवार को 95.6950 प्रति डॉलर पर बंद हुआ, हफ्ते भर में करीब 0.3 प्रतिशत कमजोर होकर। सुनने में यह छोटी गिरावट लग सकती है, लेकिन इसके पीछे की कहानी ज्यादा दिलचस्प है क्योंकि रुपये को गिरने से बचाने में RBI की सक्रिय भूमिका साफ नजर आ रही है। जून से शुरू हुए policy कदमों की बदौलत करीब 73 अरब डॉलर का capital inflow आया है, जिसने देश के foreign-exchange reserves को मजबूती दी है। यही वजह है कि इस हफ्ते रुपये के बड़े दायरे में बंधे रहने, यानी rangebound रहने, की उम्मीद जताई जा रही है।

पर यहां एक बात समझनी जरूरी है और वो है कि RBI किसी करेंसी को हमेशा एक तय स्तर पर रोके रखने की गारंटी नहीं देता। अगर crude तेजी से भागा और importers की dollar demand अचानक बढ़ी, तो intervention की जरूरत भी उसी अनुपात में बढ़ेगी। असली सवाल यह नहीं है कि RBI रुपये को बचा सकता है या नहीं बल्कि सवाल यह है कि कितने लंबे समय तक, और किस कीमत पर।

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आम आदमी की जेब पर असर कैसे पड़ेगा

अगर डॉलर 95 से 96, 97 या उससे ऊपर सरकता है, तो crude oil के अलावा electronics के पुर्जे, industrial machinery, chemicals, कुछ pharmaceutical inputs और कई imported consumer products महंगे हो सकते हैं लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि रुपये में एक रुपये की गिरावट से रातोंरात सब कुछ महंगा हो जाएगा। यह इस पर निर्भर करता है कि कोई कंपनी कितना आयात करती है, उसकी pricing power कितनी मजबूत है, और वह बढ़ी हुई लागत ग्राहक पर डालती है या खुद अवशोषित करती है।

किस sector पर सबसे पहली चोट पड़ेगी

Aviation इस लिस्ट में सबसे ऊपर है की crude महंगा हुआ तो ATF महंगा होगा और airline की operating cost सीधे बढ़ेगी। Paints और tyres जैसे sectors भी असुरक्षित हैं क्योंकि इनकी बहुत सी raw materials petroleum-linked हैं। Chemicals और logistics companies भी इसी दायरे में आती हैं, क्योंकि feedstock और diesel दोनों की लागत बढ़ने का सीधा असर margins पर पड़ता है।

दूसरी तरफ, oil और gas producers को ऊंची crude prices से फायदा हो सकता है लेकिन refiners का गणित इतना सीधा नहीं है। उनके लिए सिर्फ crude का दाम नहीं, बल्कि crude cost, product prices, refining margins और inventory का असर मिलाकर देखना पड़ता है। इसलिए crude बढ़ने का मतलब यह नहीं कि हर oil कंपनी का stock अपने आप ऊपर जाएगा।

Bond Market: जो कहानी headlines में नहीं दिखती

ज्यादातर लोग सिर्फ Sensex और Nifty पर नजर रखते हैं, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम का एक शांत मगर अहम gवाह bond market है। पिछले हफ्ते भारत की 10-year benchmark bond yield 9 basis points बढ़कर 6.8495% पर पहुंच गई इस financial year की सबसे बड़ी साप्ताहिक बढ़त। इस हफ्ते yield के 6.80 से 6.89% के दायरे में रहने का अनुमान है।

यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं है। जब crude बढ़ता है, महंगाई की आशंका बढ़ती है और bond yields ऊपर जाती हैं यानी सरकार और कंपनियों के लिए कर्ज लेना महंगा होता जाता है। RBI के minutes में भी persistent inflation risks को देखते हुए भविष्य में rate hikes की गुंजाइश की तरफ इशारा मिला है, और crude की तेजी इस risk को और हवा दे सकती है। यही RBI का असली dilemma है एक तरफ growth को सहारा देने की जरूरत, दूसरी तरफ महंगाई पर लगाम कसने की मजबूरी।

आगे नजर किन बातों पर रखनी चाहिए

अगले कुछ दिन आज की market movement से कहीं ज्यादा मायने रखते हैं। ध्यान देने वाली बातें साफ हैं अमेरिका के sanctions सिर्फ Iran तक सीमित हैं या उसके oil buyers तक भी पहुंचते हैं, Iran किस तरह जवाब देता है, Brent crude किस दिशा में जाता है, USD/INR 95-96 के दायरे में कैसा बर्ताव करता है, और RBI कितनी सक्रियता से market में उतरता है।

तीन तस्वीरें संभव हैं। अगर sanctions सीमित रहते हैं और Gulf shipping सामान्य चलती रहती है, तो crude स्थिर या नीचे रहेगा, रुपया शांत रहेगा और बाजार को राहत मिलेगी और यह सबसे अच्छा scenario है। अगर Iran का oil export वाकई प्रभावित होता है, तो crude ऊपर जाएगा, import bill बढ़ेगा और रुपये पर दबाव के साथ-साथ equities में उतार-चढ़ाव बढ़ेगा। और सबसे कड़ा scenario तब बनेगा जब बात Strait of Hormuz तक पहुंच जाए  तब यह सिर्फ Iran का मसला नहीं रहेगा, बल्कि एक global energy supply shock में बदल सकता है, जहां crude में तेज उछाल, करेंसी में उथल-पुथल और दुनियाभर के बाजारों में risk-off का माहौल देखने को मिल सकता है।

आखिर में बात इतनी सी है

अगर sanctions सिर्फ एक headline बनकर रह जाते हैं और crude काबू में रहता है, तो आम भारतीय पर इसका तुरंत कोई बड़ा असर नहीं पड़ेगा। लेकिन अगर oil लंबे समय तक महंगा बना रहता है, तो यह असर धीरे-धीरे पहले fuel, फिर transport, फिर logistics, फिर product की कीमतों के रास्ते आपके घर के खर्च तक पहुंच सकता है।

तो आज सिर्फ यह पूछना काफी नहीं कि Nifty ऊपर बंद हुआ या नीचे असली सवाल यह है कि Iran पर sanctions लगने के बाद crude अगला कदम क्या उठाता है। फिलहाल strong capital inflows और RBI की सतर्क मौजूदगी रुपये को एक भरोसेमंद कुशन दे रही है, लेकिन यह कुशन हमेशा के लिए नहीं है इसकी मजबूती crude की अगली चाल पर टिकी है।

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