Railway Projects 736 Crore:- रात की ट्रेन में सो रहे हों, तो हम में से ज्यादातर लोग ये नहीं सोचते कि इंजन में बैठा आदमी कितनी देर से जाग रहा है। सिग्नल देखना, रफ्तार संभालना, सब उसी के हाथ में है। और इंसान है तो चूक की थोड़ी गुंजाइश भी है, चाहे वो कितना ही तजुर्बेकार क्यों न हो। रेलवे ने इसी गुंजाइश को घटाने के लिए चार राज्यों में चार प्रोजेक्ट मंज़ूर किए हैं, कुल लागत करीब 736 करोड़ रुपये।
ये चारों उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और गुजरात में हैं, और हर एक अलग रेलवे ज़ोन के तहत आता है। किसी का ताल्लुक ट्रेन की सुरक्षा से है, किसी का सिग्नल से, एक बिजली का है, और एक तो सीधा उन लोगों के काम का है जो सड़क पर फाटक खुलने का इंतज़ार करते हैं।
लखनऊ डिवीज़न में Kavach, 252 करोड़
सबसे मोटी रकम, 252 करोड़, उत्तर प्रदेश के हिस्से आई है। नॉर्थ ईस्टर्न रेलवे के लखनऊ डिवीज़न में 607.7 किलोमीटर पर Kavach 4.0 लगेगा, उन हिस्सों में जहां अभी ये नहीं है।
Kavach का नाम खबरों में बहुत आता है, तो एक बार ठीक से समझ लेना अच्छा रहेगा। ये एक automatic train protection system है, जो ट्रेन की हरकत पर लगातार नज़र रखता है। ड्राइवर कोई सिग्नल छोड़ दे या ट्रेन तय रफ्तार से ज्यादा तेज़ चलने लगे, तो ये खुद ब्रेक लगा देता है। ड्राइवर की जगह नहीं लेता। वो अपना काम करता रहता है, Kavach बस तब बीच में आता है जब कुछ गड़बड़ हो जाए।
सर्दियों की किसी घनी कोहरे वाली सुबह, जब सिग्नल मुश्किल से दिखता है, ऐसे सिस्टम की कीमत सबसे ज्यादा समझ आती है। थकान इंसान को होती है, मशीन को नहीं।
सोलापुर, गुंटूर और उधना के काम
पैसे का हिसाब एक बार जोड़कर देखिए: 252, 209, 142 और 133 करोड़, कुल 736। इसमें से 461 करोड़, यानी करीब 63 प्रतिशत, सीधे टक्कर और चूक से बचाने वाली तकनीक पर जा रहा है, Kavach और interlocking पर। बाकी बिजली और फाटक के काम में लगेगा। मतलब रेलवे की प्राथमिकता में इस बार सुरक्षा साफ तौर पर ऊपर दिख रही है।
महाराष्ट्र में सेंट्रल रेलवे(Railway) के सोलापुर डिवीज़न को 209 करोड़ का electronic interlocking मिलेगा। ये सात स्टेशनों पर लगना है: मोहोल, मुंडेवाडी, बाले, सोलापुर, होटगी जंक्शन (होटगी ए केबिन समेत), शहाबाद और वाडी जंक्शन। Interlocking का मोटा मतलब ये है कि स्टेशन पर सिग्नल और पटरी बदलने वाले points आपस में ऐसे बंधे रहते हैं कि दो ट्रेनों को टकराने वाला रास्ता मिल ही न सके। अब तक ये काम relay वाली पुरानी व्यवस्था करती थी, आगे से कंप्यूटर करेगा, और ट्रेनों की आवाजाही ज्यादा भरोसेमंद हो जाएगी।
आंध्र प्रदेश का प्रोजेक्ट 142 करोड़ का है। इसमें कुछ नया बनता हुआ नज़र नहीं आएगा, फिर भी शायद यही सबसे ज़रूरी कामों में से है। साउथ कोस्ट रेलवे(Railway) के सावल्यापुरम से गुंटूर तक 73 किलोमीटर के सेक्शन में बिजली की सप्लाई मज़बूत की जानी है। ये दोहरी लाइन है, यानी कुल 146 track किलोमीटर। electric ट्रेन अपनी ताकत ऊपर की तार से लेती है, और ट्रेन जितनी भारी या तेज़, बिजली की भूख उतनी बड़ी। सप्लाई कमज़ोर हो तो सबसे पहले भारी और तेज़ गाड़ियां चलाने में दिक्कत आती है। अपग्रेड के बाद आगे ट्रैफिक बढ़ने पर भी गुंजाइश बची रहेगी। ऐसे काम अक्सर नज़र नहीं आते, पर पूरी लाइन की सेहत इन्हीं पर टिकी होती है।

गुजरात वाला प्रोजेक्ट 133 करोड़ का है, और रोज़ की ज़िंदगी में शायद सबसे सीधा फर्क यही डालेगा। वेस्टर्न रेलवे(Railway) के उधना-उकाई सोनगढ़ सेक्शन में एक level crossing की जगह चार लेन का road overbridge बनेगा। खर्च रेलवे और राज्य सरकार आधा-आधा उठाएंगे। मुख्य रेलवे ब्रिज के साथ 311.58 मीटर का viaduct और 524.32 मीटर की approach road भी इसी में शामिल है।
फाटक पर खड़े होकर ट्रेन निकलने का इंतज़ार, दोनों तरफ गाड़ियों की कतार, हॉर्न का शोर, हम सबने कभी न कभी ये झेला है। पुल बन जाने के बाद सड़क और रेल का ट्रैफिक अलग-अलग चलेगा। न फाटक पर रुकना पड़ेगा, न वहां होने वाले हादसों का डर रहेगा। ट्रेन को भी सड़क वालों की वजह से धीमा नहीं होना पड़ेगा।
बुलेट ट्रेन की खबर भी उसी दिन आई
उसी दिन की एक और खबर इस पूरी बात के साथ जुड़ती है। मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन का पहला हिस्सा, सूरत से वापी तक, 2027 में शुरू करने का लक्ष्य है। रिपोर्ट के मुताबिक निर्माण दिसंबर 2026 तक पूरा होने की उम्मीद है, और रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने संकेत दिया है कि उद्घाटन 2027 के मध्य के आसपास हो सकता है। भारत में बन रही बुलेट ट्रेन के अप्रैल या मई 2027 तक पटरी पर पहुंचने की बात भी कही गई है, जिसके बाद इसकी लंबी testing चलेगी।

तो एक तरफ पुरानी पटरियों पर सुरक्षा की परतें जोड़ी जा रही हैं, और दूसरी तरफ आने वाली रफ्तार की तैयारी हो रही है। दोनों काम अलग किस्म के हैं, पर ज़रूरत दोनों की है। बुलेट ट्रेन चर्चा में ज्यादा रहती है क्योंकि वो नज़र आती है, चमकदार है, नई है। जबकि Kavach या बिजली की सप्लाई जैसे काम चुपचाप होते हैं और तभी याद आते हैं जब कुछ बिगड़ता है। इसीलिए ऐसी मंज़ूरियों पर भी नज़र रखना ज़रूरी है, भले ही इनकी खबर उतनी सुर्खियां न बटोरे।
कुल मिलाकर
चारों प्रोजेक्ट्स एक ही दिशा में जाते हैं: सफर ऐसा हो जिसमें कम से कम चीज़ें इंसान की एक चूक पर टिकी हों। कहीं ट्रेन को खुद रुकना सिखाया जा रहा है, कहीं स्टेशन के सिग्नल को दिमाग मिल रहा है, कहीं बिजली की लाइन मज़बूत हो रही है, और कहीं सड़क को रेल के रास्ते से हटाया जा रहा है।
एक बात ध्यान रखने लायक है। ये सब मंज़ूरियां हैं, काम अभी पूरा नहीं हुआ है, और बड़े प्रोजेक्ट्स की समय-सीमा अक्सर आगे-पीछे होती रहती है। पर जब ये पूरे हो जाएंगे, तो रात की ट्रेन में सोते वक्त थोड़ा और बेफिक्र रहा जा सकेगा।
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